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मार्क्स का जन्मदिन

आज मार्क्स का जन्मदिन है. इस मौके पर कहना चाहता हूँ कि समाजवाद, वामपंथ, कम्युनिज्म और मार्क्सवाद एक-दूसरे से संबद्ध होते हुए भी स्वतंत्र अभीमुखीकरण रखते हैं. कहना यह भी है कि रूस में लेनिन ने जबरन वर्ग चेतना वेनगार्ड्स के माध्यम रोपित की और चीन में माओ ने यह मानते हुए कि कम्युनिज्म के बाद भी द्वन्दात्मक पदार्थवाद जारी रहता है और सतत क्रांति का सिद्धांत अपनाया; इसलिए रूस और चीन की सफलता और असफलता सीधे ही मार्क्सवाद की सफलता-असफलता नहीं है. मै बारंबार इस निष्कर्ष पर भी पहुंचता हूँ कि पूंजीवाद की जो विसंगतियाँ मार्क्सवाद ने चिन्हित कीं, उन्हीं पर काम करके पूंजीवाद ने कल्याणकारी राज्य का चोला पहना और वैश्वीकरण के रूप में आज समूचे विश्व में प्रभावी है. #श्रीशउवाच

#YesIMSecular

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Satish Acharya अब तो नहीं ही है लेकिन काफी लंबे समय तक इसका जरूर फर्क़ पड़ता था कि जिससे मिल रहा हूँ या बात कर रहा हूँ, वह किस जाति और धर्म का है। एक गाढ़ा पूर्वाग्रह रहता ही था। फिर कितने ही लोगों से मौका मिला और अलग-अलग लोग एक-एक कर कितने ही पूर्वाग्रह तोड़ते चले गए। सौभाग्य से बेहतर पढ़ने को मिला तो और भीतर से कई पूर्वाग्रह टूटे। सेकुलर होना मेरे लिए अब एक कोई राजनीतिक स्टैंड नहीं है। यह अब जीवनशैली का हिस्सा है। आसान नहीं है क्योंकि जाति और धर्म, अपने देश की राजनीति की कबाड़ साइकल के कभी न पंक्चर होने वाले दो पहिए हैं और लगभग हर दल को चुनाव में इसी जैसी एक साइकल पर सवार होने की आदत पड़ गई है, तो लगभग हर चुनाव के आसपास ऐसा जरूर कुछ होता या किया या कराया जाता है जिसकी वज़ह से जाति और धर्म के आधार पर नफरत जरूर बह रही होती है। उस बयार में भ्रामक सूचनाएँ बांटी जाती हैं और ऐसे में एक तार्किक व्यक्ति भी कब विक्टिम से परपीट्रेटर बन जाता है, पता ही नहीं चलता। बचपन में नहीं जानता था, काफी बाद में सहसा मैंने पूछा और पापा जी ने बताया था कि मेरा यह संस्कृत नाम श्रीश, मेरे पहले स्कूल 'इंडियन...

राजनीति विशेषज्ञ प्रभु दत्त शर्मा को अंतिम प्रणाम

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20/04/2020 उन दिनों (2002-05) जब मैं स्नातक का विद्यार्थी था गोरखपुर विश्वविद्यालय में तो राजनीति शास्त्र विषय से बहुत परेशान रहा करता था। सीनियर यथासम्भव समझाने के बाद अंततः कोटेशन रटने को कहते थे जो बीए में नंबर लाना है तो, बात सच भी थी, मूल्यांकन यों ही होता था। राजनीति के एक-दो अध्यापकों को छोड़कर किसी के बारे में क्या ही कुछ कहना, प्रणाम। आज सोचता हूँ कि सरकारी विश्वविद्यालय में नौकरी (योग्यता/अयोग्यता  के बाद भी) इतने पापड़ बेलने के बाद मिलती है तो अब उस जीव से और अधिक क्या ही उम्मीद करना। उन दिनों राजनीतिक विचारकों को समझना एक अलग ही स्वैग था। प्रकाशक-लेखक स्टार्ट-अप विधान में लिखी हुई कई किताबें थीं, जिनमें हर तीसरी पंक्ति में एक कोटेशन दिया होता था। परीक्षा में अंक के लिए तो वे यकीनन आदर्श थीं, लेकिन अंततः समझ नहीं आता था कुछ। क्या, कुछ, क्यों मन में बेचैन होकर बौखलाये से उमड़ते रहते थे। अपने यहाँ बक्शीपुर के पुस्तक विक्रेता कई बार स्पष्ट बताते थे कि कौन सी पुस्तक आपके लिए ठीक है। मैंने अपने किसी सीनियर से कहीं सुना कि पी डी शर्मा की बुक मिल जाए तो बहुत बढ़िया है थाॅट के ल...

अमरीका को लेकर गफलत में कभी नहीं रहा।

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08/04/2020 Image Source: The Balance # अमरीका_को_लेकर_गफलत_में_कभी_नहीं_रहा । थोड़ा भ्रम उनकी आधुनिक सुविधाओं को लेकर जरूर था, लेकिन कोरोना ने वह भी साफ कर दिया। पूरी दुनिया में अपने रंगरूट बिछाने वाले और सभी छोटे बड़े अनगिन देशों को बम थमाने वाले देश के पास जरूरी दवा, मास्क और सैनीटाइजर पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं। उनकी मीडिया इस शर्म से बचने के लिए अब बस चीन के खिलाफ कुछ कांसपिरेसी थ्योरीज ही जब तब कुक कर रही है। वहीं देखिए जर्मनी को, कितनी मजबूती से वह इस महामारी का सामना कर रहा है। दक्षिण कोरिया और चीन एशिया के चमकते सितारे हैं जिन्होंने इस महामारी में अपनी आंतरिक मजबूती का प्रदर्शन किया है, उम्मीद मुझे भारत से भी है। अमरीका की अर्थव्यवस्था का बबल तो सब प्राइम क्राइसिस में ही बर्स्ट हो गया था, लेकिन दो-दो विश्वयुद्धों से अर्जित साख से वह दुनिया भर के देशों को अमरीकी बॉन्ड बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सका। यह अमरीका का भाग्य ही था कि कुर्सी पर ओबामा थे, ट्रंप के बस की तो नहीं ही थी। जब तक ब्रिटिश साम्राज्यवाद का घृणित इतिहास समझ पाया, स्नातक के वर्ष खत्म हो रहे थे। ब्रिटेन...

Sorry for Realistic Pessimism

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07/04/2020 Image Source: The Medium I was really a naive one when in the beginning I used to think on the lines that it was actually the pressure of market forces which make a significant portion of media behave as mere loudspeaker of the government in the greed of handsome government advertisement. India is the vast land of diversity of people and of varied sets of opinions, profitability can be explored in other way round also. Earlier, I sensed the working of ABP news, they use d to take the anti government stand. They kept changing their stance as government got changed after the election. This channel always found its own kind of audience and kept going. Now, this channel too has changed its tone for long back. Now, I have begun to realise that regime concept is even bigger than to market forces. It's not market who could customise the design and pattern of regimes of a country but actually dominant regime of a country can mould the behavior and structure of market forces. Reg...

पॉलिटिक्स पढ़ने पढ़ाने का फायदा क्या

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Hobbes को यही लगा था तो राजनीति को उसने फिजिक्स के तर्ज पर ढालकर विषय का पुनरोद्धार कर पॉलिटिक्स का गैलिलिओ बनने की ख्वाहिश पाली थी . एकबारगी डेविड ईस्टन को भी यही लगा था. अंततः यह समझा गया कि मानविकी विषय में तथ्य (fact) और मूल्य (Values) का सुन्दर समावेशन (inclusion) हो . Exactness जहाँ विज्ञान का गुणधर्म है वहीँ dynamism मानविकी का. प्रचलित विज्ञान निर्जीव (inanimate) का अध्ययन अधिक करते हैं, जहाँ कहीं सजीव (animate ) का अध्ययन करते भी हैं तो उनके स्थिर सार्वत्रिक गुणधर्मों (universal properties) तक सीमित होते हैं . मानविकी जीवित मन का अध्ययन करती है . इसमें exactness ना होना इसकी खूबसूरती और खासियत है . यह अधिक सूक्ष्म और व्यापक (universal) है . इसमें केवल तथ्यों से काम नहीं चलता . ध्यान दें, इकोनोमिक्स और ज्योग्रोफ़ी क्रमशः objectification की ओर बढ़ रहे हैं, एक तरफ पृथ्वी ऑब्जेक्ट है और दुसरी तरफ अर्थ (Money). ऐसा नहीं है कि विज्ञान बिना मूल्यों के निर्वहन कर सकता है अथवा उसमें केवल exactness ही है. एक समय उसमें यह कल्पना की गयी कि नाभिक में इलेक्ट्रान प्रोटोन और न्यूट्रोन ठीक वैस...

वो भूंकते कुत्ते...

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कड़क सी सर्दी, रजाई में उनींदे से लोग सपनों की खुमारी में आँखें लबालब जब जो जैसा चाहते बुनते रचते, समानांतर सपनों की दुनिया, पर बार-बार टूट जाते वे सपने। खुल जाती डोरी नींद की कच्ची, बरबस मुनमुनाते गाली उन आवारा कुत्तों पर, जो भौंक पड़ते गाहे-बगाहे। (Google Image) क्यों नहीं सो जाते कहीं ये कुत्ते भी मजे लेते मांस के सपनों की, या फिर खेलते खेल ,खो सुधबुध    गरमाहट छानते पीढ़ी-दर-पीढ़ी। कुछ लोग होते ही हैं, तनी भवें वाले होती है उन्हें चौंकने की आदत गुर्राते हैं सवाल लेकर, मिले ना मिले जवाब दौड़ते हैं, भूंकते हैं, पीछा करते हैं, लिखते हैं...! जिन्दगी की रेशमी चिकनाइयों से परहेज नहीं पर बिछना नहीं आता, कमबख्तों को। चैन नहीं आता उन्हें, पेट भरे हों या हो गुड़गुड़ी। शायद शगल हो पॉलिटिक्स का, सूंघते हैं पॉलिटिक्स हर जगह, करते हैं पॉलिटिक्स वे  शक करते रहते हैं, हक की बात करते रहते हैं। लूजर्स, एक दिन कुत्ते की मौत मर जाते हैं.... ये, ऐसे क्यों होते हैं....? चीयर्स....! देश आगे बढ़ तो रहा है। ये नहीं बदलना चाहते, भुक्खड़। मेमसाहब का कुत्ता कितना समझदार है, स्पोर्टी...! हौले से गोद में ...

स्वतंत्रता व सुव्यवस्था के नोट्स : श्रीश

मन में कई विचार गोते लगा रहे हैं. पर सबसे पहले   श्याम जी   द्वारा लिखे गए वे शब्द और वाक्य जिन्हें मैंने अपनी डायरी में लिख लिए हैं... ये लाइनें शून्यकाल में मेरा बहुत साथ देंगी. और ये पंक्तियाँ सूत्रवाक्य हैं..कई कुंजियों का समवेत छल्ला है..उन्हें देखें: " जब चर्चा चल ही पड़ी है तो लगते हाथ बहुत पहले" सारिका" में पढ़ी धर्म की वह परिभाषा भी उद्दृत कर दूं जो पांच दशकों के बाद भी मुझे भूली नहीं .."अनासक्त विवेक से समष्टि कल्याण के हेतु किया जाने वाला कोई भी कर्म धर्म है." " यह मन कैसे बनता है ? निश्चित रूप से क्रिया प्रतिक्रिया ( stimulus and response cycle) चक्रों से मन निर्मित होता है." " वृत्त की आवृति =वृति" " उन्होनें आदतों के जमावड़े को कुण्डलिनी कहा है" " जितनी लघु , संकुचित और सीमित जीवन-दृष्टि ; उतनी ही तेज़ी से भागता है समय.. जीवन-दृष्टि जितनी व्यापक होती चली जाती है ; समय की गति भी उसी अनुपात में धीमी होती चली जाती है .. जब दृष्टि अस्तित्व की व्यापकता को पा लेती है..तब समय ठहर जाता है.. विलीन हो जाता है ..आदमी के गणि...

भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरु की शहादत

देश के लिए किया गया कोई भी योगदान छोटा या बड़ा नहीं होता, वह महनीय ही होता है। शहादतों की तूलना करना किसी भी शहादत का अपमान ही करना है। भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरु की शहादत इसलिए बड़ी नहीं है कि किसी और महापुरुष की शहादत छोटी है, बल्कि वह शहादत बड़ी है ही क्योंकि वो प्यारे भारत के लिए की गई थी। मेरी विनम्र श्रद्धांजली...!!!

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी

साल 1996....!!! अखबार का पहला पन्ना थोड़ा-थोड़ा समझ आने लगा था। 'राव बनाएं, फिर सरकार' के पोस्टरों को फाड़ सहसा एक लोकप्रिय नेता भारत का प्रधानमंत्री बनने जा रहा था। उस जमाने में हम सभी उनकी तरह बोलने की नकल करते थे। शब्दों के बीच का अंतराल चमत्कार पैदा करता था, क्योंकि सहसा वे कुछ ऐसा कह जाते थे, जिसकी मिठास घंटो घुली होती मन में...! हिन्दी भाषा कितनी गरिमामयी हो सकती है...ये हम महसूस कर रहे थे...आज भी कह सकता हूं, मातृभाषा में जो बात है वो आंग्लभाषा में कहां...? श्री अटल बिहारी वाजपेयी....! मेरे होश में तो यदि राष्ट्रपति के तौर पर कलाम साहब ज़ेहन में छाए रहेंगे हमेशा तो प्रधानमंत्री के तौर पर अटल जी की जगह कोई नहीं ले सकेगा। प्रधानमंत्री जो कवि-हृदय हो, सक्रिय और जमीनी राजनीति का लंबा अनुभव लिए हो, समर्पित हो और बेदाग भी हो, स्पष्टवादी भी हो और मृदुभाषी भी हो...! विदेश नीति पर जिसकी व्यक्तिगत छाप हो...., सिद्धान्तवादी भी हो और समन्वयवादी भी हो....और दूजा कौन - भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी...!!! भारत रत्न जब वाकई भारत के रत्न को मिलता है तो खुशी भी मुकम्मल होती है। "मेरे...

Caste politics is costly, but who cares?

Caste politics is costly, but who cares? इसे बचाए सभी रखना चाहते हैं...बस तर्क अलग हैं. caste के बचने से किसी का धर्म बच जाता है, किसी के संस्कार सुरक्षित रहते हैं, किसी के पुरखे स्वर्ग में चैन से रहते हैं, किसी का रक्त शुद्ध बना रहता है, किसी का बदला पूरा होने लग जाता है..किसी की नौकरी लग जाती है...किसी नकारे की शादी हो जाती है. किसी का नकारा, नेता बन जाता है,किसी की वकालत चल जाती है, किसी की दूकान चल निकलती है. किसी को ठेका मिल जाता है, कोई ठेके पे भर्ती करवाने लग जाता है.   जब इतने फायदे हैं इसके तो जमाये रखते हैं जाति को. ‪#‎ श्रीशउवाच‬  

Loudspeakers of Media

In today's media scenario, there are many loudspeakers, it is now not dominated by one or two or three institutions. So, there is no possibility for uniformity in media voice. Each loudspeaker has own voice, guided by own player system. We can't judge any issue from taking only one or two references, it is not the era of Doordarshan. The politics and its manifestations vary according to the time, era, generation, crisis and challenges. Texture and taste of government in true democracy are exact reflection of people who actively engage in political participation. Today, people are fed up with corrupt practices, lots of layers of rhetorics, red-tapism...,...., etc. They have chosen their government. This new regime must act as they promised to do. It would not be fair to compare two government working styles in a same breath. We, the people, of India, have no patience to give even some time to AAP for judgement having their manifasto in hands, but We want that AAP guys should hav...

वातानुकूलित बौद्धिकों के सैद्धांतिक तर्क

....आज लगभग हर अखबार में आपको ऐसे वातानुकूलित बौद्धिकों की सैद्धांतिक तर्क-आयोजनों की भरमार मिल जायेगी, जो उन्होंने  #AAP के ऐतिहासिक सफलता के पक्ष में रखे होंगे. ध्यान दीजिये, ये वही लोग है जो दो दिन पहले तक #AAP के अस्तित्व तक से परहेज करते थे. अख़बारों में, टीवी की बहसों में उन्हें कांग्रेस-भाजपा के आगे कुछ सूझता नहीं था. (इसमें टीवी एंकरों को तो जाने दीजिये- उन्हें तो रंग बदलते दिख जाने की मजबूरी से भी गुजरना ही पड़ता है). इनके आतंक से ही "आम आदमी" अपनी "खासियत" भूल जाता है.  इसमें से कई नामी पत्रकार-संपादक लोग भी हैं, जिन्होंने मौसम को भांपते हुए यहाँ फेसबुक पे भी कुछ यों स्टेटस लिखा-"कम से कम मै तो कही रहा था",.....! ये वे लोग हैं, जिन्हें पहले हुई सभी क्रांतियाँ महान लगती हैं, और उसके अनगिन कारण भी वे गिनाते हैं. इन्हें सामने का कुछ नज़र नहीं आता. ये वे लोग हैं जिन्हें लोकतंत्र की मजबूतियों से ज्यादा उसकी कमजोरियों में अखंड विश्वास है. ये खाए-पीये-अघाए लोग जाने कितनी ही ऐसी क्रांतियों की ऐसे ही भ्रूण-ह्त्या कर देते हैं..दिनों-दिन अपने कुतर्कों से. क्या...

देश परिवार समाज : एक विमर्श

....नवोत्पल(http://navotpal.wall.fm/forum/topic/2?&page=1) पर हुई एक पुरानी चर्चा को यहाँ रख रहा हूँ, इसमें श्याम जी ने बड़े करीने से कुछ चीजें रखी हैं, शायद मित्रों को पसंद आये...! अंकित ...... ......The Real Scholar Aug 14 '10 Message #1 सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैदिल पे रखकर हाथ कहिये   देश क्या आजाद है...? प्रश्न तो कई दशक पुराना है ...पर उत्तर आज तक किसी ने नहीं दिया .......क्या इस पर नावोत्पल में कुछ चर्चा करना उचित होगा? Shyam Juneja Aug 15 '10 Message #2 इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर चर्चा मैं एक शिवसूत्र से करना चाहूँगा .."धी वशात सत्व सिद्धि.. सिद्ध स्वतंत्र भाव.."हमारे यहाँ गायत्री मन्त्र में भी "धी" की ही मांग की गई है ..पंजाब में "धी" शब्द का प्रयोग बेटी के लिए किया जाता रहा है.. शायद कहीं कहीं आज भी प्रचलित है ..और शायद स्त्री के सम्मान में कही गई एक शब्द की सबसे सुन्दर कविता है यह "धी" ..क्या है धी ? कृष्ण ने गीता में जिसे "व्यवसायात्मिका बुद्धि" कहा है..कृष्णमूर्ती इसे "सजगता" कहते हैं ... आम बोल...