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भारत-पाकिस्तान का करतारपुर कनेक्शन

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लोकतंत्र की विडंबना यह है कि सत्ता की निरंतरता की चाह दलों को अपनी सरकार बनाने और बचाने के लिए अंततः सबकुछ दाँव पर लगाने को उद्यत कर देती है और दल सत्ता के लिए ऐसा करने भी लग जाते हैं। दल, सत्ता के अपने पाँच सालों में लगभग हमेशा ही कुछ यों अपनी गतिविधियाँ रखते हैं कि उन्हें चुनाव में इसका फायदा अवश्य मिले। भारत-पाकिस्तान संबंध भी सीमा के दोनों ओर की सरकारों की इस मानसिकता से लगातार प्रभावित होता रहा है। पंजाब, जो कि सीमा के दोनों ओर फैला है और दोनों ही देशों का महत्वपूर्ण राज्य है, संबंधों की इस अनिश्चितता से सर्वाधिक प्रभावित होने वाला नागरिक-समुदाय है। खालिस्तान-संघर्ष का भयावह अध्याय इसमें सुरक्षा व आतंकवाद के महत्वपूर्ण तत्व भी जोड़ता है, जिससे सरकारें और भी एहतियात बरतती हैं और संबंधों में एकप्रकार की ठंडी जड़ता पसरी रहती है। इन ठिठके रिश्तों में सहसा एक हलचल हुई जब भारतीय पंजाब के राज्य सरकार के एक मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू अपने क्रिकेटर मित्र इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने पाकिस्तान पहुँचे और मंच पर पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से गले लग गए। यह तस्वीर और ...

भारत और चीन के मध्य नेपाल ब्रिज या बफर स्टेट?

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साभार: नवभारत टाइम्स  चीन-नेपाल संबंधों के बारे में इतिहास के पन्ने बहुत कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं और इसका एक बेहद महत्वपूर्ण कारण भौगोलिक रूप से नेपाल का चीन से केवल उत्तर की ओर से जुड़ना है। तिब्बत की ओर से चीन से जुड़े नेपाल पर चीन की नज़र हमेशा रही है लेकिन भारत-नेपाल संबंध व भारत की तिब्बत मुद्दे पर दिलचस्पी को देखते हुए चीन सशंकित ही रहता आया था। नेपाल के राजतांत्रिक लोकतंत्र से लोकतांत्रिक गणतंत्र बनने की विकासयात्रा के मध्य उभरे वामपंथी नेतृत्व की उपस्थिति से चीन को नेपाल के करीब आने में एक सहूलियत अवश्य हुई है। नेपाल जहाँ चीन की ओबोर नीति को समर्थन देने वाले देशों में अग्रणी देश बना वहीं उसी ओबोर नीति के तहत चीन ने नेपाल में भारी निवेश करना शुरू किया। सितम्बर माह में ही चीन ने 2.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश की घोषणा की जो चीन-नेपाल क्रॉस बॉर्डर रेलवे लाइन विकसित करने में प्रयुक्त होगा। चीन और नेपाल ट्रांजिट प्रोटोकॉल के लिए सहमत हुए हैं जिससे नेपाल अपनी जरुरत के मुताबिक छह बॉर्डर पॉइंट्स यथा- रसुवा, तातोपानी, कोरला, कीमाथांका, यारी और ओलांगचुंग गोला का इस्तेमाल कर सकेगा।...

बस डोलता बस बोलता बिस्मार्क

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मोदी सरकार के चार वर्ष: विदेश नीति समीक्षा साभार: गंभीर समाचार  "लोग उतना झूठ कभी नहीं बोलते जितना कि शिकार के बाद, युद्ध के दरम्यान और चुनाव के पहले बोलते हैं। " - ऑटो वॉन बिस्मार्क अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के विदेश नीति का आधार, झुकाव और कार्यशैली कमोबेश एक-सी रही। उसमें ‘परिवर्तन और सततता’ का गुण विद्यमान था। अवसर अनुकूल जोखिम लिए गए और मूलभूत मुद्दों पर दृढ़ता बनी रही। दोनों सरकारों ने अपने क्षेत्र के पड़ोसियों से संबंध बनाये रखने का महत्त्व समझा था और विश्व-राजनीति में एक स्पष्ट रुख रखते हुए जहाँ-तहाँ संबंधों को बनाने की दिशा में प्रयासरत रहे। विश्व-राजनीति का एकल ध्रुव अमेरिका बना हुआ था और उसके सबप्राइम क्राइसिस से दुनिया उबरी ही थी। भारत के संबंध अमेरिका से क्रमशः प्रगाढ़ हो रहे थे और रूस से संबंध सततता में थे। पर्यावरण, खाद्य-सुरक्षा और संयुक्त राष्ट्र सुधार जैसे मुद्दों पर भारतीय रुख स्पष्ट था और लोकतांत्रिक समानता पर आधारित था। भारत के पड़ोस में परेशानियाँ थीं फिर भी दक्षेस की बैठकें जारी थीं। भारत में जब मई, 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बहुमत से चुनी गयी थ...

संघर्ष के एक मुहाने पर फिर श्रीलंका

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साभार:  गंभीर समाचार  जबसे हिंद महासागर की अंगड़ाई लेती लहरें चीन की नज़रों में चढ़ी है, क्षेत्र के द्वीपीय देशों को जैसे उसकी नज़र ही लग गयी है। मालदीव की सरकार के द्वारा देश में आपातकाल की सीमा बढ़ाये जाने के एक पखवाड़े बाद ही श्रीलंका के कुछ ऐसे हालात हो गए कि सरकार को आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी। वैसे यह दोनों आपातकाल किसी भी रीति से आपस में संबद्ध नहीं हैं; यह ज़रुर है कि दोनों देशों का औपनिवेशिक अतीत ही है जिससे वर्तमान में भी शांति और विकास आकाश कुसुम बने हुए हैं l मालदीव का आपातकाल सत्तालोलुपता में जहाँ लोकतंत्र के खिलाफ है वहीं श्रीलंका का आपातकाल सत्तासीन सरकार द्वारा सांप्रदायिक शक्तियों के मंसूबों के खिलाफ लिया गया एक सख्त कदम है जो देश के लोकतंत्र को मजबूती देगा l भारत के नज़रिये से देखें तो दोनों ही देशों के आंतरिक मामलों में अलग-अलग समयों में भारत द्वारा हस्तक्षेप किया गया है l दोनों ही अवसरों पर भारत को आमंत्रित किया गया l श्रीलंका में 1987 में भारत उलझ गया था वहीं 1988 में मालदीव में शांति स्थापित करने में सफल रहा था l भारत अपनी ऐतिहासिक वैश्विक एवं क्षेत्रीय भूमिका क...

मालदीव संकट और भारत

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महज सवा चार लाख की आबादी वाले छोटे से देश मालदीव ने अपने राजनीतिक संकट से पूरी दुनिया की नज़र भारत पर केंद्रित कर दी है। मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने मालदीव के पहले लोकतांत्रिक रीति से निर्वाचित राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद सहित हाई प्रोफ़ाइल नौ राजनीतिक बंदियों को रिहा करने और 12 सांसदों की सदस्यता बहाल करने का निर्देश दिया। संसद सदस्यता के बहाल होने का अर्थ यह है कि मौजूदा राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की सरकार अल्पमत में आ जाएगी और उनके विरुद्ध संसद महाभियोग पारित कर सकेगी। यामीन ने खतरा भांपते हुए और संभवतः अपना आखिरी दांव चलते हुए देश में 15 दिवसीय आपातकाल की घोषणा कर संसदीय कामकाज सहित सारे कामकाज ठप कर दिए हैं, आशंका है वे इसे आगे भी बढ़ा सकते हैं । उनके निर्देश पर सेना ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व यामीन के भाई पूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम को गिरफ्तार कर लिया है तथा संसद को घेर लिया है। निर्वासित राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने भारत से प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कर लोकतंत्र को बचाने की गुहार लगाई है और अमेरिका से भी मदद की दरख्वास्त की है। भारत ने कड़े शब्दों में मालदीव से लोकतंत्र बहाली क...

संविधान और मै से हम

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चौपाल भारत  राजनीति एक दिलचस्प चीज है। ये सबमे है, सबकी है और सबसे है। इसके बावजूद अक्सर ये ताने सुनती है। गुनाह हम बुनते हैं, इल्जाम राजनीति पर आ चिपटती है। जैसे ही ‘मै’, ‘हम’ में तब्दील होता है, राजनीति का क्षेत्र शुरू हो जाता है। यूपी-बिहार में ‘मै’ कम ‘हम’ ज्यादा बोला जाता है, इल्जाम भी इन्हीं दो पर ज्यादा आता है राजनीति करने का।  खैर..! जैसे ही कहीं सबकी बात शुरू होगी, राजनीति वहां होगी। ‘राजनीतिक’ का सैद्धांतिक अर्थ ही है-‘सबसे सम्बंधित’। हालाँकि अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग परिस्थितियों में राजनीति-व्यवस्था अलग-अलग प्रकार की बनी मिलती है। कहीं राजनीति सबकी और सबसे होती है, इसे लोकतान्त्रिक व्यवस्था कहते हैं और कहीं राजनीति कुछ की और कुछ्से होती है, उसे अलोकतांत्रिक व्यवस्था कहते हैं। यह दोनों बड़े सरल विभाजन हैं, इसलिए विश्व में सीधे-साफ़ दिखलाई नहीं पड़ते। दरअसल विश्व में तो सब गड्ड-मड्ड है। कहीं राजनीति सबसे है पर सबकी नहीं है। कहीं कुछ्से है पर सबकी होने का वादा है। कहीं वह है तो सबसे पर काम किसी और की कर रही है। और दावा सबका है तेज आवाज में कि -वे एक लोकतान्त्रिक राजनीतिक ...

चीन की ओबोर नीति ओर भारत-अमरीका सहयोग

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डॉ. श्रीश पाठक भारत की पहली महिला रक्षा मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण की हालिया अमरीका यात्रा के दौरान अपने समकक्ष रक्षा सचिव जेम्स मैटिस के साथ हुयी मुलाकात खासा सफल जान पड़ती है l जेम्स मैटिस ने बेहद स्पष्ट शब्दों में पाकिस्तान-चीन आर्थिक गलियारे की आलोचना करते हुए भारत का पक्ष दुहराया कि यह गलियारा एक विवादित भू-भाग का हिस्सा है और कोई भी राष्ट्र एकतरफा किसी क्षेत्रीय ‘ मेखला ओर मार्ग पहल ’ (बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) की घोषणा नहीं कर सकता l अब निश्चित ही अमरीका एशिया में अपने क्षेत्रीय हितों के लिए ठोस भूमिका निभाने को तैयार दिखता है l इस भूमिका में भारत स्वाभाविक रूप से अमरीका का रणनीतिक साझीदार है l भारत ने भी जतला दिया है कि वह एशिया ओर दक्षिण एशियाई मामलों में अमरीका के साथ मिलकर अपने राष्टीय हितों का सरंक्षण करने को तत्पर है l दरअसल चीन की पाकिस्तान के साथ आर्थिक गलियारे बनाने की कोशिश उसकी एक अतिमहत्वाकांक्षी परियोजना ओबोर नीति का एक हिस्सा है l ओबोर नीति चीन के मौजूदा राष्ट्रपति जी जिनपिंग की सामरिक दिमाग की उपज है l घरेलू राजनीति में भ्रष्टाचार पर बेहद ठोस कदम उठाकर जी जिनपि...

त्योहारों के रेलें, मेले और भारत

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डॉ. श्रीश पाठक भारत में भानमती के कुनबे बहुत है । ये इसकी खूबसूरती है, पहचान भी और है इसकी मजबूती भी । अपने देश में जाने कितने देश बसते हैं । तरह-तरह के लोग, तरह-तरह की आदतें, रस्में तरह-तरह की और तहजीबें तरह-तरह की । तरह-तरह के पकवान, तरह-तरह के परिधान, तरह-तरह की बोलियाँ और तरह-तरह के त्यौहार । हाँ, त्यौहार...! अपना देश तो त्योहारों का देश है और भारत देश है मेलों का भी । हमारे यहाँ मंडी तो नहीं पर मेलों की रिवायत रही है । कोस-कोस पे पानी का स्वाद बदलता है और तीन-चार कोस पे बोली बदल जाती है और तकरीबन हर पंद्रह-बीस कोस बाद भारत में कोई न कोई मेले का रिवाज मिल जायेगा । प्रसिद्द मेलों की बड़ी लम्बी फेहरिश्त है और कमोबेश पूरे भारत में है यह । मेले जो कभी हर महीने लगते हैं, कुछ बड़े मौसम-परिवर्तन पर लगते हैं और कुछ साल के अंतराल पर लगते हैं । इन सतरंगी मेलों में भांति-भांति के लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, एक-दूसरे की खासियतें समझते हैं, जरूरतें साझा करते हैं, रिश्ते बनते हैं, नाटक, खेल देखते हैं, इसप्रकार मेले दरअसल स्थानीयता का उत्सव होते हैं । त्योहारों का भी मूलभूत दर्शन उत्सव ही है । कभी प...