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विश्व राजनीति में मीडिया

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 “जो मीडिया को नियंत्रित करता है वह मन को नियंत्रित करता है।  (जिम मॉरिसन )” साभार: गंभीर समाचार  अभिव्यक्ति के लिए भाषा और उसके संकेत चिन्हों को दर्ज करने की तकनीक के सहारे मानव ने अभूतपूर्व प्रगति की है। साझी सामाजिक स्मृति सहेजी जा सकती है और भविष्य के लिए प्रयोग में भी लाई जा सकती है। मानव-अभिव्यक्ति के अनगिन माध्यम विकसित हुए। उन सभी मीडियम्स का बहुवचन ही मीडिया कहलाता है । जैसे-जैसे राजनीतिक संरचनाएँ विकसित होती गयीं, मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती गयी। यों तो इतिहास के पन्नों में मीडिया के कितने ही रंग हैं लेकिन अब जबकि संपूर्ण विश्व में एक राजनीतिक मूल्य के रूप में लोकतंत्र स्वीकार्य हो चला है, मीडिया की भूमिका कमोबेश अब यह स्थापित है कि वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में जवाबदेही व पारदर्शिता सुनिश्चित करता है और नागरिक-समाज एवं सरकार के मध्य सेतु बनकर राजनीतिक संक्रियाओं के निर्वहन में योग देता है।  वैश्वीकरण और मीडिया का वैश्विक स्वरूप  संचार क्रांति ने समूचे दुनिया से एक क्लिक पर संपर्क-सम्बद्धता उपलब्ध करा दिया है। इंटरनेट ने पूरी दुनिया को चौबी...

पाकिस्तान पर दबाव बनाने के पीछे कहीं अमेरिका की ये रणनीति तो नहीं

"अमेरिका ने मूर्खतापूर्ण रीति से पिछले पंद्रह सालों में सहायता के नाम पर तैतीस बिलियन से भी अधिक राशि पाकिस्तान को दी है, और उन्होंने हमें बस झूठ, धोखा दिया है कि जैसे हमारे नेता मूर्ख हों। उन्होंने उन आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह दी, जिन आतंकवादियों को हम अफ़ग़ानिस्तान में उनकी थोड़ी सहायता से खोज रहे थे। … अब नहीं !" अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने नए साल के अपने छठे ट्वीट से दक्षिण एशियाई, खासकर पाकिस्तानी राजनीति में खलबली मचा दी। ट्रम्प के बयानों को लेकर विश्लेषक कुछ पसोपेस में रहते हैं, जो अक्सर अस्पष्ट, विरोधाभासी और सनसनीखेज होते हैं, किन्तु यह ट्वीट बेहद करारा, स्पष्ट और निर्णायक था। भारत-अमेरिकी रिश्तों की तुलना में अमेरिकी-पाकिस्तानी रिश्ते ज्यादा गहरे और शीतकालीन समय के जांचे-परखे रिश्ते रहे हैं, ऐसे में जबकि भारत-अमेरिका रिश्तों की ऊष्मा बढ़ रही तो भारत के लिए भी यह ट्वीट खास मानी गयी।  ट्रम्प के इस ट्वीट के बाद पाकिस्तान की तिलमिलाहट साफ़ दिखी और पाकिस्तान के विदेश मंत्री जनाब ख्वाजा मोहम्मद आसिफ साहब ने उसी ट्विटर पर कई करारे जवाब दिये और लिखा कि जल्द ही पाकिस्तान ट...

2017: भारतीय कूटनीति का लेखा-जोखा

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पिछला साल महज उपलब्धियों वाला नहीं रहा है, अपितु भारतीय कूटनीति के लिए कई सबक देकर यह वर्ष विदा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र के अभिकरण इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में भारतीय जज दलवीर भंडारी की पुनर्नियुक्ति भारत की जबरदस्त कूटनीतिक विजय मानी गयी पर उसी संयुक्त राष्ट्र का लोकतंत्रीकरण करने के लिए सरंचनात्मक सुधार करते हुए सुरक्षा परिषद् में भारत की वीटोसहित सदस्यता के भारतीय प्रयासों में ठंडक बनी रही। यदा-कदा आते-जाते कई देशों के भारतीय अतिथि इस मुद्दे पर भारतीय पक्ष लेते रहे पर कुछ भी ठोस प्रगति नहीं हुई। भारत से अपने संबंधों में एक उन्नत स्तर की समझ की दुहाई देने वाला अमेरिका भी अपने रवैये में ढुलमुल ही रहा। पड़ोसी चीन ने तो कभी भी इस मुद्दे पर भारत का समर्थन नहीं ही किया अपितु वह कहता रहा कि सुधारों का यह उपयुक्त समय ही नहीं है। भारत समझ सकता है कि भारत के हित उसके विश्व सहयोगियों को भी वहीं तक स्वीकार्य होंगे जहाँ तक उनके हित को कोई असुरक्षा न हो।  चीन ने न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) में भी भारत की सदस्यता का पुरजोर विरोध किया। एनएसजी, परमाणु आपूर्ति राष्ट्रों का एक समूह है जो पर...

2017 की विश्व राजनीति और भारत

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पंचायत टाइम्स: पहला भाग  अब जबकि पृथ्वी 2017 का अपना चक्कर पूरा ही करने वाली है, यह एक मुफीद समय है कि इस साल की विश्व-राजनीति को पीछे मुड़कर टटोला जाय, देखा जाय कि वे कौन सी घटनाएँ थीं, जिन्होंने खासा असर पैदा किया, ऐसी वे कौन सी गतिविधियाँ रहीं, जिनके जिक्र के बिना 2017 का कोई जिक्र अधूरा रहेगा और इन सबके बीच अपना भारत कैसे आगे बढ़ा ! यह एक मुश्किल काम इसलिए तो है ही कि विश्व राजनीति की बिसात बेहद लम्बी-चौड़ी है, पर असल चुनौती इसमें वैश्वीकरण की प्रक्रिया पैदा करती है। विश्व में वैश्वीकरण है, इसके अपने अच्छे-बुरे असर हैं; पर दरअसल विश्व-राजनीति का भी वैश्वीकरण हो चला है। इसका अर्थ यह है कि अब किसी भी महत्वपूर्ण वैश्विक घटना के स्थानीय निहितार्थ व प्रभाव हैं और किसी महत्वपूर्ण स्थानीय घटना के भी वैश्विक निहितार्थ व प्रभाव हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ।संचार साधनों ने यह सुलभता तो दी है कि सभी घटनाएँ सभी स्तर पर लगभग तुरत ही उपलब्ध हैं, किन्तु इन्होने विश्व-राजनीति की जटिलताओं का और विस्तार ही किया है। इनकी अनदेखी करना सहसा विश्व-राजनीति के किसी घटना की व्याख्या में चूक जान...

पुतिनपरस्त रूस और एशियाई राजनीति

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डॉ. श्रीश पाठक* सुबह सवेरे आज का रूस एक लोकतान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्था वाला देश है। अतीत में, समाजवादी छवि के साथ रूस का सोवियत संघ के रूप में पदार्पण विश्व राजनीति में हुआ और अमेरिका के सापेक्ष द्वितीय ध्रुव बन उसने शीत युद्ध की ज़मीन तैयार की। विश्व-राजनीति में दो ही निर्णायक शक्तियाँ रहीं किन्तु सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् रूस फिर एक राष्ट्र में सीमित हो गया। रूस ने धीरे-धीरे स्वयं को सहेजा। विघटन के पश्चात् भी रूस दुनिया का सबसे बड़ा देश है किन्तु पश्चिमी विकसित देशों के साथ कदमताल करने के लिए इसे एक पुनर्निर्माण से गुजरना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र संघ में वीटोयुक्त शक्ति ने और भू-राजनीतिक दृष्टि से यूरोप और एशिया दोनों ही ही का भाग होने के कारण रूस कभी विश्व-राजनीति में अप्रासंगिक तो नहीं रहा, किन्तु इसके प्रभाव में असर जरूर आया। रूस ने कमोबेश पश्चिमी शक्तियों के साथ मिलकर पुनः अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया। रूस की राजनीति में पुतिन का प्रादुर्भाव एक दूरगामी प्रभाव लेकर आया है । कभी राष्ट्रपति तो कभी प्रधानमंत्री बन पुतिन पिछले सत्रह सालों से रूस में सर्वाधिक निर्णायक स्थिति में है...