बुद्ध एक व्यक्ति के विराट प्रकटीकरण की सम्भावना को सरल चरितार्थ कर रहे
Image Source: BBC Hindi और सहसा उन्होंने बुद्ध के अवदान को नकारना शुरू किया है। उन्हें इसपर तर्क नहीं सुनना। उन्हें यह विश्वास दिलाया गया है कि बुद्ध की शिक्षा वेदों के विरुद्ध हैं। भला हो शंकर का जिन्होंने इस भारत भूमि को बचा लिया है अन्यथा यह भूमि बौद्ध भूमि में परिणत हो जाती। ऐसे आकस्मिक निष्कर्ष स्वाभाविक हैं जब दर्शन को अक्षरशः समझने की कवायद होती है। सिद्धार्थ के कितने ही शिक्षक सनातन धर्म के अलग अलग सम्प्रदायों से आते हैं। सिद्धार्थ सभी में रमते हैं और मध्यम मार्ग तक पहुंचते हैं। बुद्ध सरल भाषा में सोSम ही कह रहे। वेदांत के समानांतर ही यात्रा कर रहे। धर्म की तत्कालीन राजनीति को खारिज कर एक सामाजिक नैतिक विकल्प सुझा रहे। बुद्ध एक व्यक्ति के विराट प्रकटीकरण की सम्भावना को सरल चरितार्थ कर रहे। शुद्ध आध्यात्मिक मूल्यों में अद्भुत साम्य परिलक्षित होता है, इसमें काल, भूगोल और भाषा का अन्तर आने नहीं पाता। कबीर के राम निराकार हो जाते हैं तो बुद्ध अवतार मान लिए जाते हैं। रामकृष्ण ने जब यह जाना, परमहंस हुए। सनातन धारा निर्झर बहती है। इसकी एक बूंद में ही सागर है, यही निरखना है, यही समझना ह...