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भारत-पाकिस्तान का करतारपुर कनेक्शन

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लोकतंत्र की विडंबना यह है कि सत्ता की निरंतरता की चाह दलों को अपनी सरकार बनाने और बचाने के लिए अंततः सबकुछ दाँव पर लगाने को उद्यत कर देती है और दल सत्ता के लिए ऐसा करने भी लग जाते हैं। दल, सत्ता के अपने पाँच सालों में लगभग हमेशा ही कुछ यों अपनी गतिविधियाँ रखते हैं कि उन्हें चुनाव में इसका फायदा अवश्य मिले। भारत-पाकिस्तान संबंध भी सीमा के दोनों ओर की सरकारों की इस मानसिकता से लगातार प्रभावित होता रहा है। पंजाब, जो कि सीमा के दोनों ओर फैला है और दोनों ही देशों का महत्वपूर्ण राज्य है, संबंधों की इस अनिश्चितता से सर्वाधिक प्रभावित होने वाला नागरिक-समुदाय है। खालिस्तान-संघर्ष का भयावह अध्याय इसमें सुरक्षा व आतंकवाद के महत्वपूर्ण तत्व भी जोड़ता है, जिससे सरकारें और भी एहतियात बरतती हैं और संबंधों में एकप्रकार की ठंडी जड़ता पसरी रहती है। इन ठिठके रिश्तों में सहसा एक हलचल हुई जब भारतीय पंजाब के राज्य सरकार के एक मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू अपने क्रिकेटर मित्र इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने पाकिस्तान पहुँचे और मंच पर पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से गले लग गए। यह तस्वीर और ...

एकजुट अमेरिकी मीडिया द्वारा #एनेमीऑफ़नन कैम्पेन

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#एनेमीऑफ़नन साभार: गंभीर समाचार  जिस दिन भारत अपनी आजादी की इकहत्तरवीं वर्षगांठ मनाने में मशगूल था उसीदिन अमेरिका के छोटे-बड़े तकरीबन साढ़े तीन सौ मीडिया-प्रतिष्ठानों ने  अमेरिकी प्रेस की आजादी के पक्ष में सम्पादकीय प्रकाशित किया । यह एक अभूतपूर्व घटना थी। पर कहना होगा कि यह उस अभूतपूर्व रवैये के विरुद्ध एकजुट प्रदर्शन था जो किसी भी अन्य अमेरिकी राष्ट्रपति में यों नहीं रही । पिछले एक अरसे से मीडिया द्वारा हो रही अपनी हर आलोचना को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ‘फेकन्यूज’ कह रहे हैं और जोर देकर दुहराते हैं कि मीडिया द्वारा कहा गया, दिखाया गया कुछ भी तथ्य नहीं है। ट्रम्प के अनुसार मीडिया, विपक्षी दल की तरह व्यवहार कर रहा है और यह देशहित में नहीं है। ट्रम्प यहाँ तक कहने लगे कि मीडिया उनकी दुश्मन नहीं बल्कि देश की दुश्मन है। ट्रम्प अपने ट्विटर अकाउंट से बमबारी करते हैं तो उसी ट्विटर पर एकजुट अमेरिकी मीडिया द्वारा #एनेमीऑफ़नन कैम्पेन चलाया गया। बोस्टन ग्लोब की अपील पर अमेरिकी मीडिया ने राष्ट्रपति ट्रम्प के इस मीडिया विरोधी रवैये का एकजुट विरोध किया।  कमोबेश पूरी दुनिया में सत्ता के साथ...

विश्व राजनीति में मीडिया

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 “जो मीडिया को नियंत्रित करता है वह मन को नियंत्रित करता है।  (जिम मॉरिसन )” साभार: गंभीर समाचार  अभिव्यक्ति के लिए भाषा और उसके संकेत चिन्हों को दर्ज करने की तकनीक के सहारे मानव ने अभूतपूर्व प्रगति की है। साझी सामाजिक स्मृति सहेजी जा सकती है और भविष्य के लिए प्रयोग में भी लाई जा सकती है। मानव-अभिव्यक्ति के अनगिन माध्यम विकसित हुए। उन सभी मीडियम्स का बहुवचन ही मीडिया कहलाता है । जैसे-जैसे राजनीतिक संरचनाएँ विकसित होती गयीं, मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती गयी। यों तो इतिहास के पन्नों में मीडिया के कितने ही रंग हैं लेकिन अब जबकि संपूर्ण विश्व में एक राजनीतिक मूल्य के रूप में लोकतंत्र स्वीकार्य हो चला है, मीडिया की भूमिका कमोबेश अब यह स्थापित है कि वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में जवाबदेही व पारदर्शिता सुनिश्चित करता है और नागरिक-समाज एवं सरकार के मध्य सेतु बनकर राजनीतिक संक्रियाओं के निर्वहन में योग देता है।  वैश्वीकरण और मीडिया का वैश्विक स्वरूप  संचार क्रांति ने समूचे दुनिया से एक क्लिक पर संपर्क-सम्बद्धता उपलब्ध करा दिया है। इंटरनेट ने पूरी दुनिया को चौबी...

आर्मी अरमानों के कप्तान इमरान

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साभार: गंभीर समाचार  पहचान की औपनिवेशिक जिद की बुनियाद पर बने पाकिस्तान का इतिहास इतना उलटफेर वाला है कि एक राष्ट्र के तौर पर इसकी इमारत को कभी मुकम्मल छत नसीब ही नहीं हुई। भारत को जहाँ 1950 में ही एक दुरुस्त संविधान मिला, वहीं पाकिस्तानी अवाम को उनका आईन आजादी के 26 साल बाद नसीब हुआ। इन बीते छब्बीस सालों में एक सशक्त राजनीतिक व्यवस्था और कुशल नेतृत्व के दारुण अभाव ने पाकिस्तान के ‘राजनीतिक विकास’ को गहरी चोट पहुंचाई और यहाँ लोकतंत्र आकाशकुसुम सा बन गया। जैसा कि औपनिवेशिक अतीत के नवस्वतंत्र राष्ट्रों में होता है कि बहुधा वहाँ ईमानदार, कुशल, लोकतांत्रिक नेतृत्व के अभाव में ‘सहज राजनीतिक विकास की प्रक्रिया’ अवरुद्ध हो जाती है और लोकतंत्र के पनपने की जमीन पर अनायास अनचाही तानाशाही की घास उग आती है, दक्षिण एशियाई परिदृश्य में पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ।  अदृश्य हाथ वाला इस्टैब्लिशमेंट और उसका डीप स्टेट   पाकिस्तान में इस अनचाही तानाशाही घास की खेती कभी प्रकट तो कभी अप्रकट रहकर सेना करती है। लोकतंत्र के सामान्य लक्षणों में से एक महत्वपूर्ण लक्षण है, नियमित अंतराल पर स्...

कश्मीरी कशमकश: नेपथ्य कथ्य

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साभार: गंभीर समाचार  जम्मू एवं कश्मीर के मायने सबके लिए एक नहीं हैं। सबकी अपनी-अपनी नज़र है और अपनी-अपनी समझ। इन सबके अपने-अपने नारे हैं और सब अपने-अपने सवालों के साथ हैं। इतिहास में आपस में लड़ते अध्याय हैं। राजनीति विरोधाभासी माँगों के जायज़-नाजायज़ होने में उलझी है। भूगोल इन सबसे बेखबर पर्यावरण की चुनौतियों को खामोशी से सह रहा। अर्थशास्त्र उस हिसाब में है कि केंद्र ने कश्मीर और जम्मू को कितना भेजा। लोक प्रशासन दफ्तर की फाइलों में हुए विकास और जमीन पर हुए विकास का अंतर मन मसोस स्वीकार कर रहा। शिक्षा, इस राज्य में अपना कोई लक्ष्य ही नियत नहीं कर पा रही। विज्ञान महज उन्हें उपलब्ध है जिनकी पहचान कश्मीरी तो है पर आबोहवा किसी मेट्रो शहर की है। दर्शन में कश्मीरीयत है पर उसकी मकबूलियत कश्मीरी नहीं है। साहित्य और भाषा के अपने संकट हैं, लिखे जा रहे तो पढ़े नहीं जा रहे, पढ़े जा रहे तो समझे नहीं जा रहे, समझे जा रहे तो फिर बोले नहीं जा रहे, बहसें एकतरफ़ा हैं लोग लामबंद हैं।  जो जम्मू है वह कश्मीर नहीं है। लद्दाख अपनी साख अलग ही छिपाए बैठा है। चीड़, चिनार, देवदार आपसे में बात नहीं कर रहे। झेलम,...

फिर वही दिल लाया हूँ...!

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गंभीर समाचार   निस्संदेह, भारतीय विदेश नीति के इतिहास में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अध्याय रुचिकर रहेगा। नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में व्यक्तिगत रूचि है और विश्व नेताओं से एक व्यक्तिगत रिश्ता बनाने में यकीन रखते हैं। लेकिन विदेश यात्राओं के मामले में उनका रिकॉर्ड यदि बेहद उल्लेखनीय है तो इसका एक कारण मौजूदा वैश्विक परिघटनाओं का बेहद अनिश्चित होना भी है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक सुपरपॉवर राष्ट्र जहाँ अपने लिए ध्रुवीकृत और स्पष्ट समर्थन चाहता है वहीं एक वर्ल्डपॉवर राष्ट्र सभी अन्य राष्ट्रों से संतुलित संबंध की आकांक्षा रखता है। अमेरिका का अपने सहयोगियों से निर्बाध समर्थन की अपेक्षा रखना ठीक वैसे ही उचित है जैसे भारत जैसे देशों का लगभग सभी महत्वपूर्ण राष्ट्रों से संबंधों की अपेक्षा रखना उचित है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया के आर्थिक परिप्रेक्ष्य ने जहाँ सर्वोच्च शक्ति अमेरिका को यह सहिष्णुता दी है कि विश्व के राष्ट्र संबंधों के मनचाहे आयामों यथा- द्विपक्षीय, बहुपक्षीय आदि में अपने अंतरराष्ट्रीय संबंध बना सकते हैं वहीं भारत जैसे देश वैश्वीकरण से उपजी अपनी नयी शक्ति व स्वीकार्यता को ‘स्...

त्रेता में मोदी और कल में ओली

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साभार: गंभीर समाचार  जब हम पैदल होते हैं तो तेज रफ़्तार गाड़ियों पर कोफ़्त होती है और जब हम गाड़ी में होते हैं तो कई बार बीच में आ जाने वाले पैदल यात्रियों पर कोफ़्त होती है। यहाँ, नैतिकता से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न वरीयता का है। विश्व-राजनीति में कुछ इस तरह ही अपने राष्ट्र के हित ही वरीय होते हैं चाहे हमारा अतीत कुछ भी हो और वर्तमान जैसा भी हो। एक समझदार राष्ट्र और उसके कुशल कूटनीतिज्ञ यह समझते हैं कि अपने राष्ट्र के राष्ट्रहित किसी दूसरे राष्ट्र के सापेक्ष तभी और उसी सीमा तक साधे जा सकते हैं, जब और जिस सीमा तक हमारे हितों की आयोजना में उस राष्ट्र को अपना राष्ट्रहित भी दिखे। भारत-नेपाल संबंधों में भारतीय कूटनीति से यह त्रुटि हाल के वर्षों में हुई है।  भारत अपने गहरे सांस्कृतिक संबंधों की थाती पर नेपाल और भूटान से आधुनिक संबंधों का निर्वहन करता रहा है। इसलिए ही भारत से लगी दोनों राष्ट्रों की सीमायें ‘ओपन बॉर्डर सिस्टम’ में हैं और दोनों राष्ट्रों के नागरिक भारतीय सीमा में आवाजाही कर सकते हैं। राष्ट्रहित कोई स्थिर मूल्य नहीं हैं। वैश्विक राजनीतिक हलचलों के अनुरूप उनमें गतिक सम्भावना ब...

बस डोलता बस बोलता बिस्मार्क

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मोदी सरकार के चार वर्ष: विदेश नीति समीक्षा साभार: गंभीर समाचार  "लोग उतना झूठ कभी नहीं बोलते जितना कि शिकार के बाद, युद्ध के दरम्यान और चुनाव के पहले बोलते हैं। " - ऑटो वॉन बिस्मार्क अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के विदेश नीति का आधार, झुकाव और कार्यशैली कमोबेश एक-सी रही। उसमें ‘परिवर्तन और सततता’ का गुण विद्यमान था। अवसर अनुकूल जोखिम लिए गए और मूलभूत मुद्दों पर दृढ़ता बनी रही। दोनों सरकारों ने अपने क्षेत्र के पड़ोसियों से संबंध बनाये रखने का महत्त्व समझा था और विश्व-राजनीति में एक स्पष्ट रुख रखते हुए जहाँ-तहाँ संबंधों को बनाने की दिशा में प्रयासरत रहे। विश्व-राजनीति का एकल ध्रुव अमेरिका बना हुआ था और उसके सबप्राइम क्राइसिस से दुनिया उबरी ही थी। भारत के संबंध अमेरिका से क्रमशः प्रगाढ़ हो रहे थे और रूस से संबंध सततता में थे। पर्यावरण, खाद्य-सुरक्षा और संयुक्त राष्ट्र सुधार जैसे मुद्दों पर भारतीय रुख स्पष्ट था और लोकतांत्रिक समानता पर आधारित था। भारत के पड़ोस में परेशानियाँ थीं फिर भी दक्षेस की बैठकें जारी थीं। भारत में जब मई, 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बहुमत से चुनी गयी थ...

इसकी एकमात्र दवाई बेशर्मी है !

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साभार: गंभीर समाचार  एक ज़माने तक 'मैन इज मेजरमेंट ऑफ़ एवरीथिंग' का जुमला काफी चला। विज्ञान के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ वह सभी कुछ तार्किक और उपयोगी समझा गया जो महज मनुष्य के काम आये। इस एकांगी दृष्टिकोण ने पशु, पादप, जलज और अंततः मनुष्य को बेहद करारी चोट पहुंचाई क्योंकि मनुष्य के अहम् को यह संज्ञान बहुत बाद में हुआ कि पर्यावरण के सभी घटक महत्वपूर्ण हैं और उनमें अंतरनिर्भरता है। वह एकांगी दृष्टिकोण तब तक सामाजिकता के सभी संस्तरों तक जा पहुँचा और फिर मानव, मानवीयता के सन्दर्भ टटोलने में ही हांफने लगा। व्यक्तिवादिता और स्वार्थ के कोष्ठकों में बंद व्यक्ति के लिए, अब 'बेनिफिट इज एवरीथिंग' ही परम लक्ष्य बन गया है। व्यक्ति जितना, समाज से इतर व्यक्तिवादिता को महत्त्व देगा उतना ही अंतरनिर्भरता (इंटरडेपेंडेन्स) से भागेगा। अपने प्राकृतिक सामाजिक स्वभाव को नकारते हुए व्यक्ति ‘निजी स्पेस’ तलाशेगा और बाजार इस विसंगति का शोषण कर ऐसी आपूर्ति करेगा कि व्यक्ति में ‘इंडिपेंडेंट’होने का छद्म भाव उपजेगा। ऐसा निर्मम बाजार अपने लिए केवल 'प्रॉफिट इज एवरीथिंग' का टैग टाँकेगा। सामाजिकता-स...