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नेपाली लोकतंत्र का प्रभात

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डॉ. श्रीश पाठक नेपाल की सांस्कृतिक-भौगोलिक वैविध्यता में पलने वाले उसके निवासियों को तीन मुख्य विभाजन में समझा जाता है; हिमाल, पहाड़ और तराई। तिब्बत से सटे ऊँचाई पर बसे हिमाल कहलाते है, पहाड़ के लोग मध्य नेपाल के निवासी हैं और भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार से जुड़े सीमाई लोग मधेशी अस्मिता वाले तराई के कहलाते हैं। यह विभाजन इतना सरल नहीं है पर नेपाली राजनीति में इनकी जटिलतायें महत्वपूर्ण हैं और इसलिए ही नेपाल की संविधान निर्माण की यात्रा इतनी दुरूह रही है। यह समय, नेपाल के लिए लोकतान्त्रिक सूर्योदय का है। एक साथ नयी सरकार केंद्र में भी आएगी और राज्यों में भी। एशिया के दो शक्तिशाली पड़ोसी देश भारत और चीन ध्यानपूर्वक नेपाल की राजनीतिक प्रगति को निहार रहे हैं क्योंकि सितम्बर 2015 के नए संविधान के मुताबिक वह सरकार लोकतान्त्रिक सरकार होगी, जो एक स्वतंत्र गणराज्य का नेतृत्व करेगी और सम्भावना अधिक इसी की है कि आगामी सरकार वामपंथी गठबंधन की होगी और अपना पाँच साल का कार्यकाल पूर्ण करेगी। आश्चर्यजनक रूप से इतनी मतभिन्नता एवं संघर्षों के इतिहास के बावजूद छोटे-बड़े कई दलों के देश नेपाल में दो बड़े गठबंधन उ...

हेग विजय और संयुक्त राष्ट्र संघ सुधार

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डॉ.श्रीश पाठक भारत की ब्रिटेन से आजादी के ही साल जन्मे जस्टिस दलवीर भंडारी इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस (आईसीजे ), हेग की पंद्रह सदस्यीय पैनल में लगातार दुसरी बार अगले नौ साल के लिए चुन गए जब उनके खिलाफ रहे ब्रिटेन के क्रिस्टोफ़र ग्रीनवुड ने आखिरी समय में अपनी दावेदारी वापस ले ली। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश रहे दलवीर भंडारी जोधपुर के हैं और उनका परिवार विधिज्ञों की विरासत वाला है। दलवीर भंडारी से आठ साल छोटे क्रिस्टोफर ग्रीनवुड भी आईसीजे में अपना नौ साल का समय पूरा कर लेने के बाद अगले नौ साल की नियुक्ति के लिए ब्रिटेन की तरफ से मैदान में थे। सर क्रिस्टोफर जॉन ग्रीनवुड लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में विधि के प्रोफ़ेसर हैं और इनकी आलोचना इनके उन विधिक तर्कों के लिए पुरे विश्व में की जाती है जिसके सहारे ब्रिटेन ने  २००२ में इराक पर अपने सैनिक बल प्रयोग को उचित ठहराया गया था। ब्रिटेन ने यह कहते हुए अपनी दावेदारी वापस ले ली कि जबकि उनका देश यह चुनाव नहीं जीत सकता, उन्हें खुशी है कि उनके नज़दीकी मित्र भारत ने यह दावेदारी जीत ली है और वे संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक पटल पर भारत का सहयोग करते रहे...

चाबहार के रास्ते

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पिछले २९ अक्टूबर को गुजरात के कांडला बंदरगाह से अफ़गानिस्तान के लिए भारत ने गेहूँ  की एक खेप ईरान के चाबहार बंदरगाह को भेजा है जो वायदे के मुताबिक लदान की छह किश्तों में पहली है. चाबहार बंदरगाह ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रान्त के दक्षिण में स्थित बेहद ही अहम बंदरगाह है. गेहूँ की यह किस्त यहाँ से सड़क मार्ग से इस प्रान्त की राजधानी ज़ाहेदान से होते हुए सीमावर्ती अफ़गानिस्तान के निमरुज प्रान्त की राजधानी ज़रांज तक पहुँचाई जायेगी. लगभग ९०० किमी की दूरी के इस सड़क मार्ग का अधिकांश हिस्सा ईरान में पड़ता है और इसे वायदे के मुताबिक ईरान ने ही विकसित किया है. ज़रांज से गेहूँ की यह किस्त अफ़गानिस्तान के प्रमुख शहर डेलाराम पहुँचाई जायेगी. डेलाराम से काबुल और अफ़गानिस्तान के बाकी प्रमुख शहर सीधे जुड़े हैं. रूट नंबर ६०६ के नाम से प्रसिद्घ ज़रांज से डेलाराम की २१८ किमी की लम्बी सड़क भारत ने आतंकी साये में बड़ी मुश्किलों से बनाई है. गुजरात के कांडला बंदरगाह से अफ़गानिस्तान के डेलाराम की यात्रा जो कि भारत के अनथक प्रयासों की यात्रा भी है; इतनी आसान नहीं रही है, पर यह बेहद संतोषप्रद है कि आखिरकार भारत इसम...