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‘आई हेट पॉलिटिक्स': एक पिछड़ा और गैर-जिम्मेदार जुमला

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साभार: दिल्ली की सेल्फी  राजनीति' एक अद्भुत शब्द है। यह विषय भी है और व्यवहार भी, प्रक्रिया भी है और कला भी। इतनी घुली-मिली है कि जो इसमें रूचि नहीं लेता यह उसमें भी रूचि लेती है। राजनीति का केवल एक 'सार्वजानिक' पक्ष ही हमें दिखलाई पड़ता है और इस पक्ष के जो खिलाड़ी हैं उनके चरित्र से ही समूचे राजनीति का हम चरित्र-चित्रण कर देते हैं। राजनीति का यह 'सार्वजानिक पक्ष' भी हमें इतना प्रभावी रूप से दृष्टिगोचर इसलिए होता है क्योंकि हमनें 'लोकतांत्रिक' शासन प्रणाली अपनाई है और इसकी कई संक्रियाओं में हमें स्वयं को परिभाग करने का अवसर मिलता है। किन्तु 'राजनीति' को केवल उसके इस सार्वजानिक पक्ष से नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि उससे पहले यह इस सार्वजानिक पक्ष का दर्शन तैयार करती है, इस प्रश्न का उत्तर तैयार करती है कि आखिर हमें कोई व्यवस्था क्यों चाहिए और अंततः यह व्यवस्था हम कैसे आत्मसात करने जा रहे हैं! यह सभी महत्वपूर्ण बिंदु हैं। विषय के रूप में 'राजनीति' पल-पल बदलते व्यक्ति के बहुमुखी विकास की चिंता करती है। व्यवहार के रूप में 'राजनीति' उन प्रक्र...

वो भूंकते कुत्ते...

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कड़क सी सर्दी, रजाई में उनींदे से लोग सपनों की खुमारी में आँखें लबालब जब जो जैसा चाहते बुनते रचते, समानांतर सपनों की दुनिया, पर बार-बार टूट जाते वे सपने। खुल जाती डोरी नींद की कच्ची, बरबस मुनमुनाते गाली उन आवारा कुत्तों पर, जो भौंक पड़ते गाहे-बगाहे। (Google Image) क्यों नहीं सो जाते कहीं ये कुत्ते भी मजे लेते मांस के सपनों की, या फिर खेलते खेल ,खो सुधबुध    गरमाहट छानते पीढ़ी-दर-पीढ़ी। कुछ लोग होते ही हैं, तनी भवें वाले होती है उन्हें चौंकने की आदत गुर्राते हैं सवाल लेकर, मिले ना मिले जवाब दौड़ते हैं, भूंकते हैं, पीछा करते हैं, लिखते हैं...! जिन्दगी की रेशमी चिकनाइयों से परहेज नहीं पर बिछना नहीं आता, कमबख्तों को। चैन नहीं आता उन्हें, पेट भरे हों या हो गुड़गुड़ी। शायद शगल हो पॉलिटिक्स का, सूंघते हैं पॉलिटिक्स हर जगह, करते हैं पॉलिटिक्स वे  शक करते रहते हैं, हक की बात करते रहते हैं। लूजर्स, एक दिन कुत्ते की मौत मर जाते हैं.... ये, ऐसे क्यों होते हैं....? चीयर्स....! देश आगे बढ़ तो रहा है। ये नहीं बदलना चाहते, भुक्खड़। मेमसाहब का कुत्ता कितना समझदार है, स्पोर्टी...! हौले से गोद में ...

JNU विवाद पर मेरी टिप्पणी.

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सच एक नहीं होता, एक वह हो ही नहीं सकता क्यूंकि सब एक साथ एक जगह खड़े नहीं होते l सबका अपना अपना सच हो सकता है, किसी का सच छोटा या बड़ा नहीं हो सकता l एक समय में किसी विषय पर सूचनाओं की उपस्थिति सम्पूर्ण नहीं हो सकती, इसलिए सच, समय समय का भी हो सकता है l कोई निष्कर्ष अंतिम नहीं हो सकता l कोई अर्थ, कोई परिभाषा अंतिम नहीं हो सकती l अभिव्यक्ति के सभी साधनों की सीमायें हैं l प्रायःयह मान लिया जाता है कि इन सीमाओं का बोध उन्हें अवश्य ही होगा जो इन साधनों के उपभोक्ता हैं, प्रयोक्ता हैं एवं नियोक्ता हैं l यकीनन किसी तथ्य के कई पहलू होते हैं l तथ्यों का अधिकाधिक संभव बोध प्रकाश हो, इसलिए परिप्रेक्ष्यों, अवधारणाओं, व्याख्याओं, दृष्टिकोणों एवं अलग अलग स्रोतों की सूचनाओं का आह्वाहन व समावेशन किया जाता है l अभिव्यक्ति की चुनौतियाँ भी गंभीर हैं l मान लिया जाता है कि इसका बोध भी उन्हें है जो अभिव्यक्ति के साधनों के उपभोक्ता हैं, प्रयोक्ता हैं एवं नियोक्ता हैं l शब्दों के सबके अपने अपने संस्कार हैं l प्रति एक शब्दों के साथ प्रत्येक व्यक्ति के अपने अपने बिम्ब हैं l वक्ता के शब्द संस्कार और श्रोता ...

स्वतंत्रता व सुव्यवस्था के नोट्स : श्रीश

मन में कई विचार गोते लगा रहे हैं. पर सबसे पहले   श्याम जी   द्वारा लिखे गए वे शब्द और वाक्य जिन्हें मैंने अपनी डायरी में लिख लिए हैं... ये लाइनें शून्यकाल में मेरा बहुत साथ देंगी. और ये पंक्तियाँ सूत्रवाक्य हैं..कई कुंजियों का समवेत छल्ला है..उन्हें देखें: " जब चर्चा चल ही पड़ी है तो लगते हाथ बहुत पहले" सारिका" में पढ़ी धर्म की वह परिभाषा भी उद्दृत कर दूं जो पांच दशकों के बाद भी मुझे भूली नहीं .."अनासक्त विवेक से समष्टि कल्याण के हेतु किया जाने वाला कोई भी कर्म धर्म है." " यह मन कैसे बनता है ? निश्चित रूप से क्रिया प्रतिक्रिया ( stimulus and response cycle) चक्रों से मन निर्मित होता है." " वृत्त की आवृति =वृति" " उन्होनें आदतों के जमावड़े को कुण्डलिनी कहा है" " जितनी लघु , संकुचित और सीमित जीवन-दृष्टि ; उतनी ही तेज़ी से भागता है समय.. जीवन-दृष्टि जितनी व्यापक होती चली जाती है ; समय की गति भी उसी अनुपात में धीमी होती चली जाती है .. जब दृष्टि अस्तित्व की व्यापकता को पा लेती है..तब समय ठहर जाता है.. विलीन हो जाता है ..आदमी के गणि...