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वी शुड नीड टू रीबूट टूगेदर।

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(फिल्म थप्पड़ की समीक्षा- डॉ. श्रीश पाठक) -------- Image Source: Scroll आँख सचमुच देख नहीं पाती। सब सामने ही तो होता है। दूसरे करते हैं, हम करते हैं, लेकिन जो हम करते हैं, देख कहाँ पाते हैं। ऐसा शायद ही कोई हो, जिसका दावा यह हो कि उसने किसी पति को किसी पत्नी को एक बार भी मारते न देखा हो। उसकी हया के चर्चे हुए और इसके गुस्से को रौब कहा गया, और यों ही हम सलीकेदार कहलाये। सभ्यता का दारोमदार स्त्रियों को बना उन्हें जब कि लगातार यों ढाला गया कि वे नींव की ईंट बनकर खुश रहें, सजी रहें, पूजी जाती रहें, ठीक उसी समय उनका वज़ूद गलता रहा, आँखें देख न सकीं। हमें बस इतना ही सभ्य होना था कि हम समझ सकें कि जब मेहनत, प्रतिभा और आत्मविश्वास जेंडर देखकर नहीं पनपते तो फिर हमें एकतरफ़ा सामाजिक संरचना नहीं रचनी। अफ़सोस, हम इतने भी सभ्य न हो सके। बहुत तरह की मसाला फ़िल्मों के बीच एक उम्मीद की तरह कभी निर्देशक प्रकाश झा उभरे थे, जिन्होंने ऐसे मुद्दे अपनी फ़िल्मों में छूने शुरू किए, जिनपर समाज और राजनीति को खुलकर बात करने की जरूरत थी। बाद में उन्होंने अपनी फ़िल्मों में एक बीच का रास्ता ढूँढना शुरू किया जिसमें ...

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियों

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साभार: फिल्मसिटी वर्ल्ड  हकीकत: 1964   डॉ.श्रीश पाठक  दो-दो भयानक महायुद्धों वाली शताब्दी अपने छठे दशक में पहुँच रही थी। शीत युद्ध की लू चल रही थी जरूर,  पर लगता था कि विश्व अब वैश्विक विनाश की ओर फिर नहीं  बढ़ेगा। दुनिया के कई देश आज़ादी की हवा का स्वाद चख रहे थे और स्वयं को इस दुविधा में पा रहे थे कि लोकतंत्र के नारे के साथ ब्रितानी विरासत ढोते अमेरिका के कैम्प में जगह बनाई जाय अथवा समाजवाद के नारे के साथ मोटाते सोवियत रूस का दामन पकड़ा जाए। ऐसे में एक तीसरे सम्मानजनक विकल्प के साथ सद्यस्वतंत्र राष्ट्र भारत सज्ज हो कह रहा था कि साथ मिलकर एक नवीन राजनीतिक-आर्थिक वैश्विक क्रम की स्थापना सम्भव है। इस विकल्प में किसी भी कैम्प में जुड़ने की बाध्यता नहीं थी, कोई प्रायोजित शत्रुता मोल लेने की आवश्यकता नहीं थी और सबसे बड़ी बात दोनों ही कैम्प के देशों के साथ सहयोग और विकास का जरिया खुला हुआ था। एक ऐसा समय जब लग रहा था कि भारत का कुशल नेतृत्व विश्व में शांति और समानता स्थापित करने में एक प्रमुख कारण बन सकता है। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की लोकप्रियता दुनिया मे...

गंगा जल वाले प्रकाश झा

..गंगा जल के बाद से प्रकाश झा अपनी फिल्मों में एक आदर्श विद्यार्थी की भांति किसी मुद्दे को डील करते हैं. विद्यार्थी बचता है एक राय देने से , पक्ष -विपक्ष दोनों की बातें अपने उत्तर में डाल देता है, परीक्षक स्वयं निर्णय करे और अंक दे..!  झा जी अब यही साध रहे हैं. यहाँ झा जी सेफ लाइन लेकर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहते हैं. (हलांकि यह भी उनका रोमानी भ्रम है-इससे उनका निजी फ्लेवर ही प्रभावित होता जा रहा है ). ये मानता हूँ कि जैसे मुद्दे वो चुन रहे हैं उसमें एक लाइन लेना आसान नही  है..पर यहीं तो कसौटी है. यही चीज तो आपको ख़ास निर्देशक बनाती है.  आप Documentary तो बना नहीं रहे.....कल को एक समझदार, दुनियादार कवि, अपनी कविताओं में भी कोई स्टैंड ना ले, बस दो विरोधी पक्ष उछाल दे किसी मुद्दे का ...तो वो भी तो खटकेगा....! फिल्म के आखिर में जब कोई निष्कर्ष नहीं आता कि कौन गलत और कौन सही, अथवा इतना ही कि कौन अधिक ग़लत और कौन अधिक सही ...तो फिर फिल्म खटकने लगती है..दर्शक अचानक संतोष करता है कि -अरे वो तो सिनेमा देखने आया था-मनोरंजन करने आया था...पर समीक्षक (अथवा सजग दर्शक) इसे पचा नहीं प...