Posts

Showing posts with the label #श्रीशउवाच

वो भूंकते कुत्ते...

Image
कड़क सी सर्दी, रजाई में उनींदे से लोग सपनों की खुमारी में आँखें लबालब जब जो जैसा चाहते बुनते रचते, समानांतर सपनों की दुनिया, पर बार-बार टूट जाते वे सपने। खुल जाती डोरी नींद की कच्ची, बरबस मुनमुनाते गाली उन आवारा कुत्तों पर, जो भौंक पड़ते गाहे-बगाहे। (Google Image) क्यों नहीं सो जाते कहीं ये कुत्ते भी मजे लेते मांस के सपनों की, या फिर खेलते खेल ,खो सुधबुध    गरमाहट छानते पीढ़ी-दर-पीढ़ी। कुछ लोग होते ही हैं, तनी भवें वाले होती है उन्हें चौंकने की आदत गुर्राते हैं सवाल लेकर, मिले ना मिले जवाब दौड़ते हैं, भूंकते हैं, पीछा करते हैं, लिखते हैं...! जिन्दगी की रेशमी चिकनाइयों से परहेज नहीं पर बिछना नहीं आता, कमबख्तों को। चैन नहीं आता उन्हें, पेट भरे हों या हो गुड़गुड़ी। शायद शगल हो पॉलिटिक्स का, सूंघते हैं पॉलिटिक्स हर जगह, करते हैं पॉलिटिक्स वे  शक करते रहते हैं, हक की बात करते रहते हैं। लूजर्स, एक दिन कुत्ते की मौत मर जाते हैं.... ये, ऐसे क्यों होते हैं....? चीयर्स....! देश आगे बढ़ तो रहा है। ये नहीं बदलना चाहते, भुक्खड़। मेमसाहब का कुत्ता कितना समझदार है, स्पोर्टी...! हौले से गोद में ...

साहित्य विभाजनकारी नहीं हो सकता, जब भी होगा जोड़ेगा.

साहित्य विभाजनकारी नहीं हो सकता , जब भी होगा जोड़ेगा.साहित्य शब्द कानों में पड़ते ही सहित वाला अर्थ दिमाग में आने लग जाता है. साहित्य में सहित का भाव है. कितना सटीक शब्द है. साहित्य शब्द में ही इसका उद्देश्य रोपित है. साहित्य विभाजनकारी नहीं हो सकता , जब भी होगा जोड़ेगा. इतना हर लिखने वाले को स्पष्ट होना चाहिए. इसीलिये जरुरी नहीं हर लेखन साहित्य में शामिल हो. मेरी दिक्कत ये है कि कुछ लोग साहित्य मतलब महज कविता कहानी समझते हैं. और इसे भी वो ' सब कुछ समझ सकने के गुरुर के साथ ' समझते हैं-मतलब ये कि उन्हें सही समझाना कठिन भी है. कविता मतलब भी वो कुछ यूँ समझते हैं कि एक लिखने की शैली जिसमें ख़ास रिदम और एक पैटर्न की पुनरावृत्ति होती है जिसकी विषयवस्तु अमूमन प्रकृति अथवा नारी की खूबसूरती होती है. कहानी मतलब भी कि एक नायक होगा..एक नायिका होगी. ज़माने से लड़ेंगे-भिड़ेंगे-फिर जीत ही जायेंगे.एक सीधी सी बात समझनी चाहिए कि किसी भी विषय-विशेष में उतनी ही गहराई और आयाम होते हैं जितनी कि ज़िंदगी की जटिलताएं गहरी होती हैं. इस तरह कोई भी विषय विशेष का महत्त्व किसी भी के सापेक्ष कमतर या अधिकतर नहीं होता...

बुद्ध पूर्णिमा

'अपने लिए स्वयं दीप बन जाना'  और  परस्पर विरोधी राहों में से 'मध्यम मार्ग' का चयन ;  महात्मा बुद्ध की इस दो सीख ने अब तक मेरा बहुत ही मार्गदर्शन किया है l जातियों से इतर मानवता में विश्वास रखने वाले और करुणा भाव से ओत-प्रोत इस महाभाव को उनके बुद्धत्व दिवस एवं निर्वाण दिवस पर स्मरण करना प्रासंगिक है और सर्वदा रहेगा l #ShreeshUvach

Grateful to Birthday Wishes :)

आह्लादित मन बहुधा कुछ विशेष प्रतिक्रिया नहीं कर पाता l इस वर्ष, वर्षगाँठ पे आप सभी का असीमित प्यार-दुलार मिला l नसीहतें भी मिलीं, कुछ ने झिझोड़ा भी-हो कहाँ तुम? याद सभी आते हैं और जानता हूँ याद सभी करते हैं l जीवन में बस इतना ही समेटा भी जा सकता है...हासिल इतना ही है ज़िंदगी का...सो खुश हूँ..और हमेशा की तरह तैयार भी l जन्मदिन हर वर्ष अपने समय पर दुन्दुभि बजाते आते हैं कि तैयार हो जाओ कुछ और नए उमंगों के लिए l मन पे गुजरा हर साल यों तो चिपका ही होता है, फिर भी नए मौके अतीत को एक तरफ रख भविष्य की हिलोर को थामने के लिए वर्तमान को तैयार कर ही देते हैं l एक बार फिर आप सबका शुक्रिया..! थैंक्स फेसबुक ... smile emoticon

आपकी अमोल शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से आभारी हूँ.

आपकी अमोल शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से आभारी हूँ. ये ज्ञात-अज्ञात दुआएं ही हैं जिनकी बदौलत ये यज्ञ पूरा हुआ l अभी भी विश्वास नहीं होता कि पूरी हो गयी पी.एच. डी. l पिछले कई सालों से ये मेरे अस्तित्व के साथ यूँ चिपक गयी थी कि यही मेरी सीमा और यही मेरा विस्तार हो गयी थी. कुछ रास्ते, कुछ लोगों के लिए आसान और कुछ लोगों के लिए बहुत ही कठिन हो जाते हैं; इसमें काबलियत बस एक पहलू है l मेरे लिए यह रास्ता बहुत ही कठिन हो गया था l सैकड़ों बार सोचा कि इस रास्ते की मंजिल का मुंह मै नहीं देख सकूँगा l शुभेक्षाएं एवं दुआओं ने ही मुझे उबार लिया l और सच में रास्ते के इस किनारे आकर मै वही नहीं रह गया हूँ, जो रास्ते के उस छोर पर था l सीखा तो बहुत कुछ l पर शायद सबसे बड़ी सीख जो सीखी वो है-धैर्य l स्वयं पे विश्वास रखते हुए धैर्य का दामन पकडे हुए चलते जाना ...बस चलते जाना.......,....! और जब भी जितना भी मौक़ा मिल जाये ..खिलखिलाते रहना-हँसते और हंसाते रहना.... smile emoticon शुक्रिया   ‪#‎ JNU‬   l डेमोक्रेटिक स्पेस की रट लगाना और डेमोक्रेटिक स्पेस उपलब्ध करवाने में बहुत अंतर है l   यहाँ हर तरह के लोगो...

आप से नाउम्मीद नहीं

आने वाले सालों में उपलब्धियां 'आप' के पास भी होंगी गिनाने को. मोल-तोल की मीडिया 'आप' के नाम का भी ढोल बजाएगी ही. बाकियों से बेहतर तो 'आप' यूँ भी करोगे क्यूंकि अभी 'आप' के पास किसी का कुछ बकाया नहीं होगा. आइये स्वागत है भारतीय राजनीति के महासागर में....मुबारक हो कि 'आप' ने देर-सबेर वही स्विम-सूट पहन लिया. उम्मीद अभी भी 'आप' से ही है, क्यूंकि अभागे ग्राहक के पास गिनी-चुनी वही दुकानें हैं और 'आप' के यहाँ फिर भी थोड़ी राहत है. 'आप' निश्चिन्त रहें, इतिहास में 'आप' दर्ज तो हो ही गए हैं....बस सोच इतना ही रहा हूँ कि 'भारतीय राजनीति को नीति की राजनीति' के लिए अभी और, आह अभी और .....प्रतीक्षा करनी होगी....! नाउम्मीद नहीं हूँ मै ! ‪#‎ श्रीशउवाच‬

जब भी मै कुछ गंभीर लिखता हूँ, मै स्पष्ट होता हूँ कि...

जब भी मै कुछ गंभीर लिखता हूँ, मै स्पष्ट होता हूँ कि 'मुझे भविष्य में कैसा समाज चाहिए?' भयाक्रांत, असुरक्षित, असंगठित, विभाजित, संकीर्ण अथवा समरस, संगठित, समन्वित, सतत, विकासोन्मुख ....! ऐसा सोचते ही मेरी भाषा संयत हो जाती है. मै सहनशील एवं साहसी हो जाता हूँ. मै आलोचना का स्वागत करने लग जाता हूँ, क्योंकि यह वो आयाम होती है, जो मुझसे संभवतः छूट जाती है. यह सोच मुझे आज की विभिन्न और बिखरी हुई कई समस्यायों के त्वरित हल से बचाती है, मध्य मार्ग की ओर ले जाती है, उनके एक सूत्रता  को पकड़ पाती है. मुझे भारत के भविष्य में विश्वास है, इसलिए मै कोशिश करता हूँ कि मेरे अध्ययन एवं ऑब्जरवेशन का कम से कम दो या अधिक स्रोत अवश्य हो. अतीत से सीख लेता हूँ, विभेद और वैमनस्य छांटकर वहीँ छोड़ देता हूँ. मै चुनता हूँ, थोड़ी सी बुरी यादों के मुकाबले थोड़ी सी अच्छी यादों को..! आँख-कान खुली रखता हूँ, क्योंकि भ्रमित कोई भी हो सकता है जिसने किसी एक विश्वास को ही अपना सर्वस्व बना लिया हो . जानता हूँ, इसलिए चौकन्ना रहता हूँ कि जहाँ मै खड़ा हूँ, वहां के अपने बायसेस हो सकते हैं, दूसरों के भी हो सकते हैं...अपने बायसे...

अपेक्षाओं की संकीर्णता

नेता, नायक, महापुरुष, समाज-सेवक, कलाकार, सरकरी सेवक, पत्रकार, अध्यापक, अधिवक्ता, चिकित्सक, अभियंता, कवि-लेखक आदि-आदि ......,...! ये सब अलग अलग लोग हैं. इन्हें अलग-अलग ही देखना होगा...! इनमे से जो भी प्रसिद्ध हो जाता है....उनमें हम सभी के गुणों की अपेक्षा करने लग जाते हैं. अपेक्षाओं की विडंबना देखिये, हम चाहते हैं, खिलाड़ी सचिन हर स्तर पर समाज के लिए 'सचिन' बन जाएँ. हम चाहते हैं कलाकार अमिताभ, हर स्तर पर समाज के लिए 'अमिताभ' बन जाएँ. बन जाएँ तो ठीक है, ना बन सकें तो क्या हम  हिसाब लेंगे...क्योंकि वे 'प्रसिद्द' हैं..? प्रसिद्धि अर्जित गुण है...इससे अपेक्षा हो सकती है किन्तु बाध्यता नहीं. जरुरी नहीं कि प्रत्येक प्रसिद्द 'नेता', 'नायक' बन फिर 'महापुरुष' भी बन जाए...!   कुछ लोग ही समन्वित अपेक्षा पर खरे उतरते हैं, अधिकांश जो नहीं पार उतर पाते अपेक्षाओं के पहाड़ से उनका मूल योगदान भी भुलाया जाने लगता है. हर क्षेत्र के रोल मॉडल अलग अलग लोग होते हैं/होने चाहिए. कोई एक ही रोल मॉडल हर क्षेत्र में हम अपेक्षा करेंगे तो उस रोल मॉडल को बेजान मूर्ति बनते ...

परिवर्तन और विरोधाभास

......सतत दबावों में तोष के लिए सहज ही जो समानांतर मै रच लेता हूँ मानस में...कहीं...., तू उससे ही तो नहीं ना रच लेता है 'भविष्य' ...बता ? ...और तो मुझे लगता है जैसे-परिवर्तन और विरोधाभास बस दो ही धर्म हैं जीवन के ..! ‪#‎ श्रीशउवाच‬
Be stereotype..! They like you; so they would accept you. Refuse to be typecast..! Only those who love you; could accept. People challenge even the danger of challenge. In this way, status quoists are more dynamic. आप उन्हीं लकीरों पर चलो. लोग जो पसंद करते हैं, जरुर स्वीकार कर लेंगे आपको. संभवतः कुछ आपको आदर्श भी मानने लगें. उन लकीरों को अस्वीकार कर चलिए, लोग जो आपसे प्रेम करते हैं, शायद वही आपको स्वीकार कर सकें. लोग 'चुनौतियों के खतरे तक ' को चुनौती देते हैं, इन अर्थों में यथास्थितिवादी कहीं अधिक प्रयत्नशील हैं, चूँकि उन्हें सतत विरोध करना है. (कल 'रंगरसिया' फिल्म देखने के बाद ...सोचने लगा. ) ‪#‎ श्रीशउवाच‬

भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरु की शहादत

देश के लिए किया गया कोई भी योगदान छोटा या बड़ा नहीं होता, वह महनीय ही होता है। शहादतों की तूलना करना किसी भी शहादत का अपमान ही करना है। भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरु की शहादत इसलिए बड़ी नहीं है कि किसी और महापुरुष की शहादत छोटी है, बल्कि वह शहादत बड़ी है ही क्योंकि वो प्यारे भारत के लिए की गई थी। मेरी विनम्र श्रद्धांजली...!!!

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी

साल 1996....!!! अखबार का पहला पन्ना थोड़ा-थोड़ा समझ आने लगा था। 'राव बनाएं, फिर सरकार' के पोस्टरों को फाड़ सहसा एक लोकप्रिय नेता भारत का प्रधानमंत्री बनने जा रहा था। उस जमाने में हम सभी उनकी तरह बोलने की नकल करते थे। शब्दों के बीच का अंतराल चमत्कार पैदा करता था, क्योंकि सहसा वे कुछ ऐसा कह जाते थे, जिसकी मिठास घंटो घुली होती मन में...! हिन्दी भाषा कितनी गरिमामयी हो सकती है...ये हम महसूस कर रहे थे...आज भी कह सकता हूं, मातृभाषा में जो बात है वो आंग्लभाषा में कहां...? श्री अटल बिहारी वाजपेयी....! मेरे होश में तो यदि राष्ट्रपति के तौर पर कलाम साहब ज़ेहन में छाए रहेंगे हमेशा तो प्रधानमंत्री के तौर पर अटल जी की जगह कोई नहीं ले सकेगा। प्रधानमंत्री जो कवि-हृदय हो, सक्रिय और जमीनी राजनीति का लंबा अनुभव लिए हो, समर्पित हो और बेदाग भी हो, स्पष्टवादी भी हो और मृदुभाषी भी हो...! विदेश नीति पर जिसकी व्यक्तिगत छाप हो...., सिद्धान्तवादी भी हो और समन्वयवादी भी हो....और दूजा कौन - भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी...!!! भारत रत्न जब वाकई भारत के रत्न को मिलता है तो खुशी भी मुकम्मल होती है। "मेरे...

In dealing with Pakistan...

In dealing with Pakistan, major obstacle is that to whom you should deal. In Pakistan, there are several power centres but none is accountable. Achchhe din vali Government must deal with those International actors on which Pakistan is fairly dependent. As a country, until we don't have capacity to bargain and negotiate with those actors, we cannot ever come in a position to resolve problems regarding Pakistan.  Diplomatic-economic inability of New Delhi is taking continuously precious lives of our beloved and great soldiers on borders. Our borders are compromised just because; Delhi often merely believes in rhetoric and slogans rather than concrete actions.  ‪#‎ श्रीशउवाच‬

माना, बचपन इतना भी बेख़ौफ़ ना होता हो सबका

माना, बचपन इतना भी बेख़ौफ़ ना होता हो सबका, पर जैसी भी जिन्दगी है किसी की, बचपन का अल्हड़पन याद जरुर आता होगा. तेरा-मेरा था, तरोड़-मरोड़ ना था, नीच-ऊंच था भी तो उसका महत्त्व कुछ ना था. जानते कुछ ना थे, जानना सब चाहते थे. प्यार जितना भी नसीब था, हिसाब नहीं था. खेल खेल में मेल और मेल मेल में रेलम रेल हो जाती थी...हंसी-खुशी की फुलझड़ियाँ सबके पास होती थीं. बचपन में हम बड़े बनना चाहते थे, बड़े बनकर हम बड़े जानते हैं कि हम कितने लम्बे, महीन और कमजोर हो गए. बेजान कागज के नोट की अहमियत , जान दार तितलियों से अधिक हम समझदार आंकने लगे...! पता नहीं हम बड़े हुए या छोटे हुए....पता नहीं. ‪#‎ श्रीशउवाच‬

Caste politics is costly, but who cares?

Caste politics is costly, but who cares? इसे बचाए सभी रखना चाहते हैं...बस तर्क अलग हैं. caste के बचने से किसी का धर्म बच जाता है, किसी के संस्कार सुरक्षित रहते हैं, किसी के पुरखे स्वर्ग में चैन से रहते हैं, किसी का रक्त शुद्ध बना रहता है, किसी का बदला पूरा होने लग जाता है..किसी की नौकरी लग जाती है...किसी नकारे की शादी हो जाती है. किसी का नकारा, नेता बन जाता है,किसी की वकालत चल जाती है, किसी की दूकान चल निकलती है. किसी को ठेका मिल जाता है, कोई ठेके पे भर्ती करवाने लग जाता है.   जब इतने फायदे हैं इसके तो जमाये रखते हैं जाति को. ‪#‎ श्रीशउवाच‬  

धर्म की बात

"धर्म की बात होती है तो सबसे पहले मुझे वोल्तेयर की कही ये उक्ति याद आती है- ईश्वर ना होता तो उसके अविष्कार की आवश्यकता पड़ती.   “If God did not exist, it would be necessary to invent him.” यह उक्ति ईश्वर अस्तित्व की बहस को एक संतुलन दे देती है. इसीलिये यह उक्ति बहुत ही खूबसूरत हो जाती है. ईश्वर हो ना हो, उसकी आवश्यकता तो है, रहेगी. हम मर्त्यशील हैं, समय की सीमा में बंधा है हमारा अस्तित्व. यह सीमित समय ही शायद हमारी सभी बेचैनियों की वज़ह है. जैसे आप कहीं घूमने जाते हो तो उस जगह   का पूरा लुत्फ़ लेना चाहते हो, कम से कम उस जगह की ख़ास चीजों को जरूर महसूस करना चाहते हो...वहां भी हम कम समय में अधिक चीजें कर लेना चाहते हैं. कम समय में अधिक चीजें कर लेने के लिए सबसे आवश्यक है कुशल मार्गदर्शन. शायद धर्म की जरूरत यों महसूस की गयी हो. समय का नुकसान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था तो अनुशासन की आवश्यकता हुई. अनुशासन के लिए अनुशासक एवं मार्गदर्शन के लिए मार्गदर्शक की आवश्यक भूमिका में ईश्वर अवतरित होते हैं. भविष्य की अनिश्चितता एवं प्रकृति के गूढ़ रहस्यों से अनभिज्ञता; ईश्वर में स्वाभाविक आस्था ...

मानविकी विषयों की हीन समझ

जिस समाज में मानविकी विषयों को विज्ञान एवं तकनीकी विषयों से हीनतर समझने की अपरिपक्वता व्याप्त है , खासे पढ़े-लिखे लोग भी मानविकी विषयों की महत्ता नगण्य ही समझते हैं, वे नहीं समझ सकते कि ये विद्यार्थी लोग क्यों विरोध कर रहे हैं सीसैट का. समाज और संस्कृति की बुनियादी समझ, विज्ञान एवं तकनीकी विषयों में भी सही मायने में उपयोगी इनोवेशन को जन्म देती है, अन्यथा उनमें विनाश के ही बीज रोपे हुए होते हैं. विज्ञान विषयों की तकनीकियों के माध्यम से, कला विषयों में भी उपयोगिता एवं यथार्थ का तत्व प्रमुखता से उभरता है. ज्ञान का कोई क्लिष्ट विभाग विभाजन नहीं हो सकता. अपने अपने अनुशासन में सभी परिश्रम करते हैं और यथासंभव योग भी देते हैं. मशीन बनाने वाले, समझने वाले लोगों को भी रचनात्मक योगदान देने के लिए एक शांत, उन्नत बेहतर समाज और सरकार चाहिए होता है...ताकि विकास का मूल उद्देश्य सुरक्षित रह सके. एक उन्नत बेहतर समाज और सरकार के लिए मानविकी विषयों में भी निरंतर शोध एवं पठन-पाठन की आवश्यकता होती है.  दुनिया के बाकि उन्नत देश जिनकी हम बेशर्म नक़ल करना चाहते हैं वे अपनी भाषा एवं इस मानविकी जरूरत की महत्ता...

राजनीति में शत्रु और मित्र

राजनीति में मित्रता और शत्रुता दोनों बराबर निभानी होती है. किसी से मित्रता की कसौटी किसी से शत्रुता होती है और किसी से शत्रुता की कसौटी किसी से मित्रता होती है. चूँकि हर बुरे से बुरे इंसान की भी कई खूबियाँ होती हैं तो कम या अधिक एवं समय-सापेक्ष हर एक के चाहने वाले होते हैं. तो राजनीति सरल नहीं है. यों भी सभी का हित साधना सरल नहीं. फिर राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं क्योंकि हित स्थाई नहीं होते. मित्र...किसी मुद्दे पर शत्रु सरीखा हो सकता है अथवा लग सकता है...अगले ही मुद्दे पर शत्रु,   मित्र सा लग सकता है l  ..तो राजनीति में शत्रु अथवा मित्र जैसी कोई चीज नहीं. लोकतान्त्रिक नेतृत्व बहुत ही जटिल है ....विरोधाभासी भी. नेतृत्व मतलब एक आवाज...एक हांकने वाला पर लोकतंत्र तो समूहवाची संकल्पना है. तो लोकतंत्र में राजनीति और भी कठिन ...! फिर राजनीति में परसेप्शन अहम् होते हैं....जो इसे और भी दुरूह बनाते हैं, क्योंकि ये सीधा तर्क पे वार करते हैं..!  अगर मीडिया स्वतंत्र नहीं हो तो ये परसेप्शन और भी तीव्र हो असर करते हैं. क्योंकि समूची जानकारी पर आम जन की पहुँच नहीं है तो मीडिया परसे...

Loudspeakers of Media

In today's media scenario, there are many loudspeakers, it is now not dominated by one or two or three institutions. So, there is no possibility for uniformity in media voice. Each loudspeaker has own voice, guided by own player system. We can't judge any issue from taking only one or two references, it is not the era of Doordarshan. The politics and its manifestations vary according to the time, era, generation, crisis and challenges. Texture and taste of government in true democracy are exact reflection of people who actively engage in political participation. Today, people are fed up with corrupt practices, lots of layers of rhetorics, red-tapism...,...., etc. They have chosen their government. This new regime must act as they promised to do. It would not be fair to compare two government working styles in a same breath. We, the people, of India, have no patience to give even some time to AAP for judgement having their manifasto in hands, but We want that AAP guys should hav...

वातानुकूलित बौद्धिकों के सैद्धांतिक तर्क

....आज लगभग हर अखबार में आपको ऐसे वातानुकूलित बौद्धिकों की सैद्धांतिक तर्क-आयोजनों की भरमार मिल जायेगी, जो उन्होंने  #AAP के ऐतिहासिक सफलता के पक्ष में रखे होंगे. ध्यान दीजिये, ये वही लोग है जो दो दिन पहले तक #AAP के अस्तित्व तक से परहेज करते थे. अख़बारों में, टीवी की बहसों में उन्हें कांग्रेस-भाजपा के आगे कुछ सूझता नहीं था. (इसमें टीवी एंकरों को तो जाने दीजिये- उन्हें तो रंग बदलते दिख जाने की मजबूरी से भी गुजरना ही पड़ता है). इनके आतंक से ही "आम आदमी" अपनी "खासियत" भूल जाता है.  इसमें से कई नामी पत्रकार-संपादक लोग भी हैं, जिन्होंने मौसम को भांपते हुए यहाँ फेसबुक पे भी कुछ यों स्टेटस लिखा-"कम से कम मै तो कही रहा था",.....! ये वे लोग हैं, जिन्हें पहले हुई सभी क्रांतियाँ महान लगती हैं, और उसके अनगिन कारण भी वे गिनाते हैं. इन्हें सामने का कुछ नज़र नहीं आता. ये वे लोग हैं जिन्हें लोकतंत्र की मजबूतियों से ज्यादा उसकी कमजोरियों में अखंड विश्वास है. ये खाए-पीये-अघाए लोग जाने कितनी ही ऐसी क्रांतियों की ऐसे ही भ्रूण-ह्त्या कर देते हैं..दिनों-दिन अपने कुतर्कों से. क्या...