#YesIMSecular


Satish Acharya

अब तो नहीं ही है लेकिन काफी लंबे समय तक इसका जरूर फर्क़ पड़ता था कि जिससे मिल रहा हूँ या बात कर रहा हूँ, वह किस जाति और धर्म का है। एक गाढ़ा पूर्वाग्रह रहता ही था। फिर कितने ही लोगों से मौका मिला और अलग-अलग लोग एक-एक कर कितने ही पूर्वाग्रह तोड़ते चले गए। सौभाग्य से बेहतर पढ़ने को मिला तो और भीतर से कई पूर्वाग्रह टूटे।

सेकुलर होना मेरे लिए अब एक कोई राजनीतिक स्टैंड नहीं है। यह अब जीवनशैली का हिस्सा है। आसान नहीं है क्योंकि जाति और धर्म, अपने देश की राजनीति की कबाड़ साइकल के कभी न पंक्चर होने वाले दो पहिए हैं और लगभग हर दल को चुनाव में इसी जैसी एक साइकल पर सवार होने की आदत पड़ गई है, तो लगभग हर चुनाव के आसपास ऐसा जरूर कुछ होता या किया या कराया जाता है जिसकी वज़ह से जाति और धर्म के आधार पर नफरत जरूर बह रही होती है। उस बयार में भ्रामक सूचनाएँ बांटी जाती हैं और ऐसे में एक तार्किक व्यक्ति भी कब विक्टिम से परपीट्रेटर बन जाता है, पता ही नहीं चलता।

बचपन में नहीं जानता था, काफी बाद में सहसा मैंने पूछा और पापा जी ने बताया था कि मेरा यह संस्कृत नाम श्रीश, मेरे पहले स्कूल 'इंडियन कॉन्वेंट स्कूल, खलीलाबाद' की मुस्लिम शिक्षिका ने रखा था। और जब जाना तो बड़ी दिली खुशी हुई। आज यह स्कूल भी नहीं हैं जो मुखलिसपुर रोड चौराहे पर हुआ करता था, नहीं जानता कि वो मैम कहाँ है, पर आज भी मेरे पास उनका दिया नाम है। मुझे औरों का नहीं पता लेकिन जैसा गाँधी चाहते थे, नेहरू, सुभाष, भगत, पटेल चाहते थे, मैं सेकुलर हूँ और मुझे फख्र है कि मेरा देश सेकुलर है।

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#श्रीशउवाच

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