अमरीका को लेकर गफलत में कभी नहीं रहा।

08/04/2020

Image Source: The Balance


#अमरीका_को_लेकर_गफलत_में_कभी_नहीं_रहा। थोड़ा भ्रम उनकी आधुनिक सुविधाओं को लेकर जरूर था, लेकिन कोरोना ने वह भी साफ कर दिया। पूरी दुनिया में अपने रंगरूट बिछाने वाले और सभी छोटे बड़े अनगिन देशों को बम थमाने वाले देश के पास जरूरी दवा, मास्क और सैनीटाइजर पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं। उनकी मीडिया इस शर्म से बचने के लिए अब बस चीन के खिलाफ कुछ कांसपिरेसी थ्योरीज ही जब तब कुक कर रही है। वहीं देखिए जर्मनी को, कितनी मजबूती से वह इस महामारी का सामना कर रहा है। दक्षिण कोरिया और चीन एशिया के चमकते सितारे हैं जिन्होंने इस महामारी में अपनी आंतरिक मजबूती का प्रदर्शन किया है, उम्मीद मुझे भारत से भी है। अमरीका की अर्थव्यवस्था का बबल तो सब प्राइम क्राइसिस में ही बर्स्ट हो गया था, लेकिन दो-दो विश्वयुद्धों से अर्जित साख से वह दुनिया भर के देशों को अमरीकी बॉन्ड बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सका। यह अमरीका का भाग्य ही था कि कुर्सी पर ओबामा थे, ट्रंप के बस की तो नहीं ही थी।

जब तक ब्रिटिश साम्राज्यवाद का घृणित इतिहास समझ पाया, स्नातक के वर्ष खत्म हो रहे थे। ब्रिटेन से बड़ा कोई सुपरपॉवर मन में कोई और उभर नहीं पाया था। आज भी अमरीका उन ऊंचाईयों तक पहुँच न सका है। उम्र के जिन वर्षों में पूरी तरह अमरीका के रंग में रंग जाना चाहिए था, संयोग से विश्व के बड़े-बड़े विचारकों एवं प्रोफेसरों को पढ़ने और जे एन यू की वज़ह से कई बार उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। एशिया की कुछ बड़ी लाईब्रेरीज में से एक लाइब्रेरी जे एन यू कैंपस में है और लगभग रोज ही कैंपस में फिल्म शो हुआ करते थे, जिनमें दुनिया भर की बेहतरीन फ़िल्में व डॉक्यूमेंट्रीज दिखाई गईं। कई बार तो निर्देशकों से भी मिलने का मौका मिला। जो सबसे अलहदा बात थी वो यह कि सभी तरह के लोग, सभी तरह की विचारधारा और सभी तरह के अनुभव क्षेत्रों के लोग मिलकर विमर्श को एकांगी होने से बचा लिया करते थे।

तो अमरीका को लेकर कोई गफलत बनी नहीं। साहित्य में अमरीका से अधिक धनवान दुनिया और यूरोप के अन्य देश सदा ही रहे। इतिहास अमरीका का पुराना है नहीं और जो जाना ही चाहें बहुत पीछे तो ब्रिटिश साम्राज्यवादियों और अमरीकी नवधनाढ्य के द्वारा किया गया हिंसा का वह नंगा नाच याद आता है जिसमें अमरीका के मूल निवासियों (रेड इंडियन्स) की बस्तियों को जला ही दिया गया और आज के अमरीकी समाज में मूल निवासियों का प्रतिशत लगभग नगण्य ही है। जिस देश का इतिहास इतना दरिद्र हो उसकी संस्कृति के कहने ही क्या। ब्रिटेन और यूरोप के औद्योगिक क्रांति से उपजे नवधनाढ्यों ने 13 कालोनियों की रचना की थी, तो इस नए समाज में व्यापार के लिए जरूरी वह सारा खुलापन था जो उदारवादी प्रेरणा से उभरा था और वह विक्टोरियन मोरलिटी से भी मुक्त था। इसकी बुनियाद पर ही अमरीकी लोकतांत्रिक मूल्यों की विराट इमारत गढ़ी गई। ऊपर से जो सबसे पहले किसी अमरीकी या अमरीका घूमने गए व्यक्ति को दिखाई पड़ता है और वह जिससे सर्वाधिक इम्प्रेस भी होता है वह है वैश्वीकरण की संस्कृति, डाइवर्सिटी की संस्कृति। पर इस नवजात कमजोर संस्कृति की नींव कितनी कमजोर है इसके दो प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। दूसरे देश से वहाँ बसे हुए नागरिकों के साथ वहाँ के नागरिकों का दोयम व्यवहार कई बार सार्वजानिक जीवन में तो उतनी खुलकर नहीं आने पाती लेकिन वहाँ के स्कूलों में उनके बच्चों के साथ दुर्भावना और दुर्व्यवहार की घटनाएं नहीं ही छुप पातीं। दूसरा उदाहरण राष्ट्रपति ट्रंप का स्वयं ही है। ध्यान से देखिए ट्रंप किन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सारी ही संरक्षणवादी नीतियाँ, जिसमें घृणा भी है चाहे वह किसी मुल्क के खिलाफ हो, गरीबों के खिलाफ हो, नस्ल के खिलाफ ही क्यों न हो। अगर आप यह कह रहे हैं कि अमरीकी समाज में समानता है तो जान लीजिए रंगभेद, नस्लभेद आदि वहाँ यों ही गायब हुए हैं जैसे हमारे देश भारत में जातिवाद और साम्प्रदायिकतावाद खत्म हुए हैं।

राजनीति के विद्यार्थी अमरीकी संविधान को अवश्य एक उपलब्धि कहेंगे और वह है भी लेकिन ब्रिटिश आधारशिला और फ्रेंच विचार उसमें से हटा लें तो वह उतना ही खोखला लगेगा जितना की अमरीका का आतंकवाद के खिलाफ प्रायोजित संघर्ष है जिसकी आड़ में वह रिसोर्स की सरेआम चोरी करता है।

अमरीकी शक्ति की बात करें तो पूँजी है उसकी शक्ति। जापान, जर्मनी, चीन, रूस आदि कई देशों के पास भी अब निर्णायक पूँजी और बाजार है। स्किल्ड लेबर भी है और रिसोर्स भी है, परमाणु बम तो है ही अब कितने ही देशों के पास। वो दुनिया नहीं रही अब कि अमरीका को दुनिया का चौधरी कह सकें। हाँ जानकारी के अभाव में किसी एक व्यक्ति के मन में ठीक वैसे ही अमरीकी गफलत पैदा और घर कर सकती है जैसे कूटनीति से शून्य किसी स्वतंत्र राष्ट्र में अमरीका के लिए अंधभक्ति जगी रहे।

#श्रीशउवाच

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