राजनीति विशेषज्ञ प्रभु दत्त शर्मा को अंतिम प्रणाम
20/04/2020
-किस ईयर में हो?
- सेकंड ईयर में।
-बीए में हो?
-हाँ (उसे जी कहने का जी न हुआ)
-ये तुम्हारे बस की नहीं है, इसे एमए के टॉपर ही पढ़ते हैं।
कोई जवाब न सुझा, मुझे। कुछ देर बाद मैंने कहा भैया ने मंगाया है। इस किताब का भौकाल ये था और गोरखपुर में हौव्वा बनाने का एक अलग ही मधुर कल्चर था।
किताब मिली मुझे, संकोच में उसके सामने किताब खोलकर देखी भी नहीं। जल्दी जल्दी पैडल मारकर होस्टल पहुँचा। मुझमें किताब पलटने की बेचैनी थी। शिशु मंदिर के आचार्यों की देन थी, किताब की हिंदी समझने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। राजनीति की यह पहली किताब थी जिसने राजनीति शास्त्र विषय में मेरी रूचि बनायी।
आज खबर मिली कि आचार्य शर्मा नहीं रहे। मुझे यों ही राजनीति के भारतीय प्रोफेसरों से निराशा रही है कि विषय के भारतीय विकास में उनका योग लगभग नहीं ही है और इसलिए ही इस विषय में रोजगार की हालत दयनीय है। इसमें हिन्दी भाषा में और भी गुणवत्तापूर्ण किताबों का टोटा है। ऐसे में राजनीतिक विचार के ऊपर एक प्रामाणिक पुस्तक हिंदी में लिखना एक उपलब्धि है।
बहुत विनम्रता से राजनीति के इस मनीषी को अंतिम प्रणाम 🙏🙏🙏

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