फेक न्यूज फिनोमेना

ज़्यादातर लोग 14 फरवरी को वैलेंटाइन दिवस के रूप में मनाते हैं, लेकिन 14 फरवरी, 1931 की सुबह लाहौर में शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दी गई थी। 
'शिक्षा से मै अंग्रेज़ हूँ, संस्कृति से मुस्लिम और दुर्घटनावश हिन्दू हूँ' -जवाहर लाल नेहरू
मैचूपो विषाणु, पैरासीटामोल टेबलेट में पाया जा सकता है। 
राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस्तीफा दिया।
भारत में लगाई गई विश्व की सबसे लंबी ऊँची मूर्ति स्टेचू ऑफ यूनिटी में अभी से दिखने लगे हैं  दरार।    

ऊपर की ये पाँचों खबरें पूरी तरह से गलत हैं। 
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी 23 मार्च 1931 को दी गई थी। जवाहरलाल नेहरू ने ऐसा वक्तव्य कभी नहीं दिया। पैरासीटामोल दवा पूरी तरह से सुरक्षित है और मैचूपो विषाणु के भारत में पाये जाने की फिलहाल कोई सूचना नहीं हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपना इस्तीफा नहीं दिया है। खबरों के लिबास में यह चारों सूचनाएँ दरअसल भ्रामक, जाली खबरें, फर्जी खबरें या फेक न्यूज हैं। बहुत मुमकिन है कि आपने भी इन खबरों को कहीं पढ़ रखा हो। अपने प्रस्तुतीकरण में ये बिलकुल असली खबरों की तरह ही होती हैं, किन्तु ये फर्जी खबरें, असल खबरों के मुक़ाबले कहीं तेजी से फैलती हैं और अपना असर छोड़ जाती हैं। एमआईटी के एक शोध के मुताबिक सही खबर के मुक़ाबले जाली खबरें सत्तर प्रतिशत अधिक रीट्वीट की जाती हैं। इसके प्रभाव व प्रयोग को देखते हुए कॉलिन्स शब्दकोश ने 2017 में 'फेक न्यूज' को अपने 'साल के शब्दों' में जगह दी है। माइक्रोसॉफ्ट की तरफ से कराये गए एक वैश्विक सर्वे के निष्कर्ष बताते हैं कि फेक न्यूज के मामले में भारत पहले स्थान पर है। इसका अर्थ यह है कि अपने इर्द-गिर्द जिन खबरों की चर्चा हम पाते हैं, उनके फेक न्यूज होने की संभावना सर्वाधिक है। फेक न्यूज से पनपे अफवाहों की वजह से भारत में भीड़ ने अलग-अलग स्थानों पर तकरीबन 25 लोगों की जानें ली हैं। बीबीसी द्वारा कराये गए एक अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि तकरीबन 72 प्रतिशत भारतीय सही खबर और जाली खबरों का अंतर समझ नहीं पाते।  


यहाँ, यह समझ लेना आवश्यक है कि फेक न्यूज (जाली खबर) और फाल्स न्यूज (गलत खबर) में अंतर है। खबरों का 'गलत' हो जाना एक मानवीय या तकनीकी चूक हो सकती है, फाल्स न्यूज संभव है कि स्रोत, माध्यम या अभिकर्ता के किसी स्तर पर हुई त्रुटि के परिणामस्वरूप प्रसार में आई हो, पर फेक न्यूज जानबूझकर एक सोचे-समझे एजेंडे के तहत प्रसार प्रक्रिया में स्थापित किए जाते हैं। फेक न्यूज का एक स्पष्ट मकसद होता है, एक लक्षित समूह होता है और चुनिंदा माध्यम पर सवार होकर यह अपने दुष्प्रभाव दिखलाती है। फेक न्यूज, पूरी तरह से भ्रामक, जाली सूचनाएँ, फोटो या वीडियो होते हैं जो जनता को भ्रमित करने के लिए, सार्वजनिक रूप से भय का माहौल बनाने के लिए, हिंसा भड़काने के लिए और एक बड़े स्तर पर जनता का ध्यान आकृष्ट करने के लिए जानबूझकर गढ़े व फैलाये जाते हैं। मीडिया साक्षरता विशेषज्ञ मार्टिना चैपमैन के अनुसार फेक न्यूज में आधारभूत तीन तत्व होते हैं: मिसट्रस्ट (विश्वासहीनता), मिसइन्फोर्मेशन (गलत सूचना) और मैनीपूलेशन (तोड़-मरोड़)। तीन देशों- भारत, नाइजीरिया और कीनिया में सात दिनों तक 80 लोगों के द्वारा खबरों को प्रयोग करने की वृत्ति को बीबीसी समूह द्वारा अध्ययन किया गया, देखा गया कि वह फेसबुक व व्हाट्सअप माध्यम का प्रयोग सूचनाओं को साझा करने के लिए कैसे और कितना करते हैं। यह पाया गया कि तीनों ही देशों में सूचनाओं के स्रोत के बारे में जानने के प्रयास न के बराबर किए गए। दरअसल, एक बढ़िया खबर के लिए उसका स्रोत, उसका माध्यम, उसकी स्पष्टता, उसकी शुद्धता और उसके अभिकर्ता/प्रसारक, ये पाँच कारक बेहद मायने रखते हैं। इन्हीं पाँच कारकों पर समझौता कर फेक न्यूज बनाए व फैलाये जाते हैं। चूंकि वे खबरों की लिबास में होते हैं तो उन्हें तुरत ही एक प्रसारसंख्या मिल जाती है, चौंकाउ व सनसनीखेज होते हैं, तो तवज्जो मिल जाती है और चूँकि इंटरनेट व सोशल साइट्स के युग में उपभोक्ता भी प्रसारकर्ता होते हैं तो फेक न्यूज को एक खतरनाक संवेग भी मिल जाता है जो कभी-कभी जानलेवा भी हो जाता है। हाल ही में कन्नूर जिले के लगभग दो लाख चालीस हजार बच्चों के माता-पिता ने जानलेवा खसरा, मम्प्स, रूबेला आदि बीमारियों के टीके लगवाने से इंकार कर दिया, क्योंकि किसी फेक न्यूज से बनी अफवाह पर उन्हें अधिक भरोसा था। टीकाकरण की प्रक्रिया पूरे दो महीने बाधित रही।      

निश्चित ही फेक न्यूज फिनोमेना ने पिछले कुछ वर्षों में बेहद खतरनाक ढंग से अपनी जड़ें जमाई हैं और इंटरनेट, मोबाइल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स के सूचना क्रांति युग में यह लगभग असंभव सा ही है कि पूरी तरह इनपर नियंत्रण किया जा सके, लेकिन यह भी सच है कि इतिहास के पन्नों में बहुत पहले ही फेक न्यूज की प्रवृत्ति दिखलाई पड़ती है। समय के हर पड़ाव पर कुछ नए प्लेटफॉर्म जुडते गए हैं पर फेक न्यूज की आवक कम-अधिक बनी ही रही है। ईसा के लगभग 44 वर्ष पूर्व आक्टेवियन ने मार्क एन्टोनी के खिलाफ भ्रामक खबरों के माध्यम से छवि धूमिल करने की कोशिश की थी। न्यूयार्क के प्रतिष्ठित अखबार 'द सन' ने 1835 में बाकायदा छह आलेखों की शृंखला प्रकाशित की थी जिसमें यह दावा किया गया था कि चंद्रमा पर न केवल जीवन की उपस्थिति है अपितु एक सभ्यता ही विकसित है। 1899-1902 के बीच चले बोअर युद्धों में भी भ्रामक खबरें खूब गढ़ी गईं और प्रसारित की गईं। प्रथम विश्व युद्ध फेक न्यूज से अछूता नहीं रहा और न ही द्वितीय विश्व युद्ध इनकी छाया से बच सका। हिटलर के शासन में तो बाकायदा 'रायस मिनिस्टरी ऑफ पब्लिक एनलाईटेनमेंट एंड प्रोपेगेंडा' बनाई गई थी जो सिलसिलेवार ढंग से भामक खबरें गढ़ती थी और उन्हें संचार के प्रत्येक उपलब्ध माध्यमों पर प्रसारित कर मनचाहा सार्वजनिक प्रभाव पैदा करती थी। शीत युद्द (1947-1991) के समय फेक न्यूज इंटेरनेशनल ब्रॉडकास्टिंग के जरिये प्रसारित किए गए। द न्यूयार्क टाइम्स ने 2004 में सार्वजनिक माफीनामा जारी किया जिसमें उसने स्वीकार किया कि इराक में वेपन्स ऑफ मास डिसट्रक्सन (जनसंहारक हथियार) की खबर फेक थी। अभी हाल ही में फेक न्यूज के प्रभाव में आकर पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने इजरायल को परमाणु आक्रमण की धमकी दे डाली। फेक न्यूज की ऐतिहासिकता व इसके खतरनाक असर को इन संदर्भों से समझा जा सकता है।      

फेक न्यूज को गढ़ने और फैलाने के पीछे की मंशा को टटोलें तो कुछ स्पष्ट कारण समझ आते हैं। बहुधा वे किसी प्रोपेगेंडा के तहत योजनाबद्ध रूप से गढ़े और प्रसारित किए जाते हैं ताकि एक खास ध्रुवीय समर्थन को साधा जा सके और विपरीत मत को खंडित किया जा सके। यह किसी दूसरे पक्ष को मिल रहे समर्थन को कमजोर करने के लिए भी किया जा सकता है। एक नए गैरज़रूरी मुद्दे को चर्चा में लाकर किसी पुराने जरूरी मुद्दे पर से जनता का ध्यान हटाने के लिए भी फेक न्यूज का सहारा लिया जाता है। विधि, प्रशासन, व्यवस्था में गड़बड़ी कर जनता में एक भय स्थापित करने की मंशा भी हो सकती है, इसे वैश्विक-आतंकवाद के दौर में एक जटिल गैर-पारंपरिक सुरक्षा-भय के रूप में भी देखा जा सकता है। एक बेहद मजबूत कारण फेक न्यूज के पीछे आर्थिक लाभ की लालसा है। इंटरनेट पर विभिन्न साइट्स पर उपलब्ध सामग्रियों को प्रयोग करने से साइट्स पर हिट आती हैं और साइट्स को इससे आर्थिक लाभ होता है। अधिक से अधिक पेजव्यूज और हिट्स पाने के लिए अक्सर भ्रामक शीर्षकों के साथ फेक न्यूज परोसी जाती है। इसप्रकार फेक न्यूज़ का एक बिजनेस मॉडल ही है, जो बेहद योजनबद्ध तरीके से फेक न्यूज डिजाइन करता है, परोसता है और फैलाता है। 

फेक न्यूज के व्यापक सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक असर को देखते हुए एक व्यापक मीडिया साक्षरता एवं डिजिटल साक्षरता अभियान की अतीव आवश्यकता है। यों तो सरकार ने अपने ढंग से मीडिया, फेसबुक, व्हाट्सअप आदि जैसे कई माध्यमों को निर्देश दिया है कि वे ऐसे फिल्टर अपने सिस्टम में निर्मित करें जिससे फेक न्यूज के प्रसार पर रोकथाम लगे परंतु यह तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक उपभोक्ता/प्रयोक्ता किसी न्यूज का प्रसारकर्ता बनने से पहले स्वयं सजग होकर सामान्य पड़ताल करने की जहमत नहीं उठता। फेक न्यूज बनाने वाले, हमारी तुरत-फुरत की फॉरवर्ड और शेयर करने की प्रवृति का ही लाभ उठाते हैं और अपना मंसूबा साधते हैं। यह बेहद अहम है कि किसी भी खबर पर यकीन और उसे साझा करने से पहले हम उस खबर के स्रोत के बारे में पड़ताल करें कि क्या यह सामग्री एक विश्वसनीय स्रोत से आई है! एक खबर को कम से कम तीन स्रोतों से जाँचें। केवल शीर्षक पढ़कर राय न बनाएँ, खबर पूरी पढ़ें और तह तक जाएँ, अक्सर ही फेक न्यूज के शीर्षकों में विस्मयादि बोधक चिन्हों की भरमार होती है। खबरों की टाइमिंग से खिलवाड़ कर भी संदर्भ बदल दिये जाते हैं, ध्यान दें कि क्या यह खबर नई है या कोई पुरानी खबर ही फिर से परोसी गई है। आप चाहे किसी भी व्यवसाय में हो एक सामान्य अध्ययन की प्रक्रिया सतत चलने दें, इससे स्वयं के पक्षपात को पहचानने और उसे ठीक करने का अवसर मिलता है और आप आसानी से किसी फेक न्यूज के शिकार नहीं बनते हैं। कई बार कुछ खबरें व्यंग के लिए लिखी जाती हैं और उसे गंभीरता से साझा कर दिया जाता है, सो सचेत रहें। इससे पहले कि यह फेक न्यूज फिनोमेना कोई बड़ी त्रासदी लेकर आए, हम सभी नागरिकों को भी इसके लिए सजग और प्रयत्नशील रहना होगा।  



Comments

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