राजनीति क्यों?
डॉ. श्रीश पाठक
![]() |
| Image Source: The New Yorker |
'राजनीति' एक अद्भुत शब्द है। यह विषय भी है और व्यवहार भी, प्रक्रिया भी है और कला भी। इतनी घुली-मिली है कि जो इसमें रूचि नहीं लेता यह उसमें भी रूचि लेती है। राजनीति का केवल एक 'सार्वजानिक' पक्ष ही हमें दिखलाई पड़ता है और इस पक्ष के जो खिलाड़ी हैं उनके चरित्र से ही समूचे राजनीति का हम चरित्र-चित्रण कर देते हैं। राजनीति का यह 'सार्वजानिक पक्ष' भी हमें इतना प्रभावी रूप से दृष्टिगोचर इसलिए होता है क्योंकि हमनें 'लोकतांत्रिक' शासन प्रणाली अपनाई है और इसकी कई संक्रियाओं में हमें स्वयं को परिभाग करने का अवसर मिलता है। किन्तु 'राजनीति' को केवल उसके इस सार्वजानिक पक्ष से नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि उससे पहले यह इस सार्वजानिक पक्ष का दर्शन तैयार करती है, इस प्रश्न का उत्तर तैयार करती है कि आखिर हमें कोई व्यवस्था क्यों चाहिए और अंततः यह व्यवस्था हम कैसे आत्मसात करने जा रहे हैं! यह सभी महत्वपूर्ण बिंदु हैं।
विषय के रूप में 'राजनीति' पल-पल बदलते व्यक्ति के बहुमुखी विकास की चिंता करती है। व्यवहार के रूप में 'राजनीति' उन प्रक्रियाओं की तमीज देती है, जिनसे 'अधिकतम का वृहत्तम हित' सधे। कला के रूप में 'राजनीति' विरोधाभासी हितों में संतुलन की प्रेरणा देती है। चूँकि लोकतंत्र सभी को राजनीति में परिभाग करने की स्वतंत्रता देती है तो 'राजनीतिक अध्ययन' से अधिक 'राजनीतिक व्यवहार' की महत्ता दिखने लगती है। गाड़ी चलाने वाला हर ड्राइवर न ट्रैफिक नियम जानता है और न ही वह निश्चितरूप से ट्रैफिक की गलतियाँ ही करता है। प्राकृतिक विज्ञानों के अलावा ज्ञान के लगभग सभी क्षेत्रों में 'अनुभवजन्य बोध' भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितने कि सैद्धांतिक बोध क्योंकि यहाँ ऑब्जेक्ट डायनामिक ह्यूमन बींग है। इसलिए अच्छा ड्राइवर होना और एक अच्छा मोटर इंजीनियर होने में फर्क है।
राजनीति के लोकतांत्रिक हस्तक्षेप ने मिस्त्री लोगों को भी पर्याप्त अवसर दिया है और वे हर बार निराश ही नहीं कर रहे हैं। समझना होगा ये हम हैं कि अपने लोकतंत्र के लिए 'इंजीनियर' के ऊपर 'मिस्त्री' प्रेफर कर रहे हैं। अरस्तु ने राजनीति को 'विषयों का विषय' कहा है और प्लेटो ने राजनीति में सबके आवाजाही की मनाही की है। प्लेटो राजा भी दार्शनिक चाहते हैं। इसलिए ही अरस्तु ने 'लोकतंत्र' को भीड़तंत्र कहा है क्योंकि इसमें योग्यता से अधिक संख्या का महत्त्व हो जाता है।
लोकतंत्र फिर क्यों? क्योंकि औद्योगीकरण के पश्चात् ज्यों-ज्यों पूंजी की हवस बढ़ी, उपनिवेशवाद आया जिसने व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलना शुरू किया। उपनिवेश ज्यों-ज्यों स्वतंत्र होते गए उन्होंने सबसे पहले अपने नागरिकों वह देना चाहा, जिससे वह वंचित थे, वह था व्यक्ति की व्यक्तित्व-स्वतंत्रता। केवल लोकतंत्र में ही समानता संभव है और उपनिवेशवाद ने समूचे उपनिवेश के प्रत्येक व्यक्ति से उसका व्यक्तित्व छीना था इसलिए आधुनिक समय में 'लोकतंत्र' एक 'व्यवस्था' से अधिक एक उदात्त 'मूल्य' बनकर उभरा।
भारत का एक औपनिवेशिक अतीत है और इतिहास कहता है कि भारत की जनसँख्या में भांति-भांति के लोगों का सुंदर सम्मिश्रण है। आजाद भारत लोकतंत्र के अलावे कोई और व्यवस्था अपना ही नहीं सकता था क्योंकि यहाँ के लोगों में विभिन्नता है और केवल लोकतंत्र उनमें 'समानता' और 'स्वतंत्रता' का विश्वास उपजा सकता था। यह विश्वास उस सद्यजात राष्ट्र को आवश्यक भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता प्रदान करता है जिसने तुरंत ही विभाजन का दंश झेला हो और जिसकी 500 से अधिक रियासतों का एकीकरण किया जाना हो। भारत के लोकतंत्र में सभी आवाजों के लिए जगह होनी चाहिए, सो सभी चुनाव लड़ सकते हैं। निर्दलीय भी। 17 % साक्षरता वाले राष्ट्र को आधुनिक राजनीतिक-समाजीकरण की प्रक्रिया से साक्षात्कार कराना जरूरी थी पर यह राज्य की तरफ से न हो नहीं तो निष्पक्ष नहीं होगा और इसके बिना व्यवस्था के ढहने का भी डर था। फिर जनता के विभिन्न मांगों को पूरा करने का कोई एक तरीका ही थोपना आगे चलकर खतरनाक हो सकता था। इसलिए राजनीतिक दलों की प्रणाली लाई गयी। भारत की महान विभिन्नता देखते हुए द्विदलीय व्यवस्था को नहीं स्वीकारा गया। बहुदलीय व्यवस्था में check & balance प्रणाली भी चल सकती है। बहुमत दल का नेता सरकार बनाये अथवा मिनिमम कॉमन प्रोग्राम के हिसाब से गठबंधन की सरकार बने और शेष सांसद उनपर पैनी नज़र रखें।
विपक्ष उतना ही जरूरी है जितना की सत्ता पक्ष। दलविहीन व्यवस्था अथवा सर्वदलीय व्यवस्था में विपक्ष अनुपस्थित होगा अथवा अंतर्निहित होगा तो कमजोर होगा, जो कि एक खतरनाक स्थिति होगी। पॉँच साल तक किसी भी तरह का सार्वजानिक नियंत्रण ही नहीं होगा। लोकतंत्र की चिंता येनकेनप्रकारेण केवल सरकार बनवा देना नहीं है, बल्कि राजनीतिक मूल्यों का संवहन करते हुए राजनीतिक विकास की गुंजायश टटोलना है। एक नया चुनाव हमेशा एक सस्ता विकल्प है बनिस्बत एक भ्रष्ट स्थिर सरकार के, जिनके घोटाले ही न पकडे जा सकें और जो पकड़ें जा सकें तो कभी उनका निपटारा ही न हो सके। गठबंधन की सरकार भारत की विभिन्नता देखते हुए स्वाभाविक है और उनकी खींचातान भी जायज है क्योंकि विरोधाभासी मांगों का संतुलन यों भी कठिन है। राजनीतिक व्यवस्था अपने संविधान के अनुरूप इतनी खूबसूरत है कि बहुमत के साथ वही दल सत्ता में आ सकता है जिसके प्रतिनिधियों में विभिन्नता से प्रतिनिधित्व बंटा हो। ऐसा नहीं होता तो गठबंधन से यह शर्त पूरी होती है।
ध्यान रहे, हमारे राष्ट्र के दो अमूर्त आधार हैं: १. एकता और २. विभिन्नता। इसलिए ही यहाँ राष्ट्रपति है तो प्रधानमंत्री भी है, मुख्यमंत्री भी है और राज्यपाल भी। किसी भी दूसरे विकसित राष्ट्र से अपने राष्ट्र की सीधी तूलना नहीं हो सकती। कांग्रेस जो कभी अपराजेय थी और भाजपा जो अभी अपराजेय लगती है, राज्यसभा में उन्हें अवश्य नियंत्रण में रहना पड़ता है।
हमारा संविधान बेहद शानदार है। पर परेशानी यही हैं। हम, अपना संविधान कितना जानते हैं!
सत्ता, ऐसी शिक्षा बनाती है जिससे पीढियाँ 'राजनीतिक अध्ययन' का महत्त्व विस्मृत कर जाती हैं। इससे राज करना आसान हो जाता है क्योंकि राजनीतिक रूप से जागरूक जनता तीखे सवाल करेगी और मीडिया का निष्पक्ष न रहना उसे तुरंत दिखेगा। सत्ता, राजनीतिक-अध्ययन से मिलने वाले रोजगार पर चोट करेगी जिससे राजनीति पढ़ने वाले साधनविहीन आदर्शवादी लगेंगे। ध्यान से देखिये, सरकार चाहेगी कि सारे महत्वपूर्ण पद जहाँ इलेक्शन नहीं सिलेक्शन की जरुरत होती है, उन्हें 'कमिटेड ब्यूरोक्रेसी' से भरा जाय, जिससे शासन आसान हो। यह माहौल बनेगा जब जनता 'कोउ नृप होय, हमें का हानि' की मानसिकता में आये और हम जनता-जनार्दन अपने-अपने घरों की जो नयी पीढ़ी है उसका सबसे बेहतर टैलेंट-पूल नौकर (ब्यूरोक्रेसी अथवा डॉक्टर, इंजीनियर ) बनाने में करते हैं और लोकतंत्र में जहाँ बॉस जनता होती है उसे अपने घर का हारा-थका, लापरवाह सेक्शन मायूसी से सौंपते हैं कि कुछ नहीं तो सरकारी ठेकेदार तो बनी जायेगा । वोट नहीं देने जाते, आसानी से वोटबैंक बन जाते हैं।
राज्य और नागरिक समाज साथ-साथ ही स्वास्थ्य के साथ पनपते हैं। इनमें से एक की अक्रियता दूसरे को रुग्ण बनाती है। नागरिक समाज, राज्य के सरकार नामक तत्व पर नियंत्रण रखती है। किन्तु भ्रष्ट सरकारें और दिशाहीन अक्रिय नागरिक-समाज 'राजनीतिक-शिक्षा (पोलिटिकल लिटरेसी) के प्रचार-प्रसार में उसी तरह चुप्पी साध लेती हैं जैसे भ्रष्ट दुकानदार दवा की एक्सपायरी डेट छुपाता है। आप सभी महानुभावों के प्रश्न और चिंताएं यह बताती हैं कि पोलिटिकल लिटरेसी का वैक्यूम बन चुका है और इसलिए ही एक निराशा का वातावरण बन गया है। पर प्रश्न उठने का अर्थ है कि अभी गुंजायश है। हमें अपने-अपने स्तर पर अध्ययन-मनन और व्यवहार की पद्धति से राजनीतिक जागरूकता बढ़ानी होगी।
संविधान का ड्राफ्ट तैयार होने के बाद बाबा आंबेडकर ने कहा था कि-वह नागरिक ही होते हैं, जो किसी देश के संविधान को सफल बनाते हैं। देखिये न, अमेरिका का संविधान कितना तो छोटा है और संसद की जननी ब्रिटेन में लिखित संविधान ही नहीं है। हमारे पास दुनिया के सबसे बड़े संविधानों में से एक संविधान है बस हम राजनीति में अपने-अपने रीति से योग ही नहीं कर रहे।
#श्रीशउवाच #Political_Literacy

Comments
Post a Comment