धीरज ....

".....जीवन का शायद सबसे कठिन कार्य है धीरज रखना. खासकर जब आपको लगता है कि किसी ना किसी प्रकार से आप लगातार प्रयत्नशील हैं. ये धीरज रखना, किसी साधारण व्यक्ति से नहीं हो सकता. बचपन में जब किसी परिणाम पर टकटकी लगा के उद्विग्न रहा करता तो बड़े बुजुर्ग समझाते कि धीरज धारण करो, बड़ी झुंझलाहट होती उस वक़्त. सारी पढ़ाई सारा ज्ञान शायद विपरीत परिस्थितियों में आपा ना खोने के लिए ही प्रशिक्षित करता है..! धीरज भी अभ्यास मांगता है...यूँ ही नहीं सध जाता...! चुप्पी धारण कर लेना धीरज नहीं है. सकारात्मकता के साथ शांतिपूर्वक सतत प्रयत्नशील रहना, धैर्य है. इस अवस्था में ही 'कर्मण्ये वाधिकारस्ते' का सही अर्थ स्पष्ट होता है.....!!! "

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