शब्द मेरी माँ जैसे हैं..

{आजकल खासा व्यस्त हूँ, और शायद आगे भी रहने वाला हूँ. चाहकर भी मित्रों की ब्लॉग-प्रविष्टियाँ पढ़ नहीं पा रहा हूँ. एहसास है कि क्या खो रहा हूँ...कुछ लिख भी नहीं पा रहा हूँ. पर जल्दी ही सबकुछ व्यवस्थित करने की कोशिश करूँगा. Ph.D. की synopsis का ड्राफ्ट तैयार 
करते हुए एक छोटी सी कविता सूझ गयी तो जल्दी में इसे आप सभी के समक्ष रख रहा हूँ... }



एक अध्यापक कहते हैं; 


'शब्दों' के एक अपने  
निश्चित अर्थ होते ही हैं, और  
उनका एक निश्चित प्रभाव होता ही है...|  


पर, एक वक्ता कहता है;  


'शब्दों' का अपना अर्थ  
इतना महत्व नहीं रखता, 
वक्ता उसमे मनचाहा  
अर्थ डाल देता है...  


सोचता हूँ; शब्द मेरी माँ, जैसे हैं..  


उनका हमेशा एक निश्चित  
मंतव्य होता है, जब वो हाथ लगा, 
सहलाते हुए समझाती हैं, पर मै... 
उन मर्यादाओं में मनचाही  
उच्छृंखलताएँ कर ही  
लिया करता हूँ...|  


यकीनन, शब्द मेरी माँ जैसे हैं...!!!  


(चित्र साभार: गूगल)

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