कि;
आज एक बेहद हलकी सी कुछ पंक्तियाँ..
कि;
कि; वे दोनों एक-एक जगह के रईस हैं..!
कि; उन दोनों की पहुँच बाकी की पहुँच से बाहर है..!
कि; वे दोनों एक दूसरे को अपनी बता देना चाहते हैं..!
कि; दोनों सामने वाले को अपने सामने कुछ नहीं समझते हैं..!
बाकी; उन दोनों को खूब जानते हैं..!
कि; पीकर दोनों रोज शाम को झगड़ा करते हैं..!!!
#श्रीश पाठक प्रखर
#श्रीश पाठक प्रखर
चित्र-साभार:गूगल
कविता के दोनों पात्र शुरू में तो रहस्यमय लगे लेकिन अन्त ????????? रोचक प्रस्तुति।
ReplyDeleteसादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
कि ; समझ पाना आसान नहीं ...
ReplyDeleteकि ; समझा पाना और कठिन ...
बाकी ; कनिष्ठिका से करेजा गुदगुदाऊँ
कि ; ........आभार .........
कि.... कि रहस्यमय गाथा बहुत अच्छी लगी......
ReplyDeleteरोचक प्रस्तुति!!!!!!!!
वाह....के आप भी गुलज़ार भक्त मालूम होते है ....उनकी एक त्रिवेणी याद आ गयी......
ReplyDeleteकि; दोनों सामने वाले को अपने सामने कुछ नहीं समझते हैं..!
ReplyDeleteरईसों के अहम् को समझना आसान नहीं है .......
कि.. सर फूट जाए तो भी नहीं सँभालते हैं ...
सही है बॉस..पत्थर ताक कर निशाने पे मा्रा है आपने..चोट भी गहरी आयी होगी..
ReplyDelete..मगर आजकल के नैनोटेक्नॉलोजी के जमाने मे हल्का होना ही तो असली असरदार होना है..
देखिये प्लास्टिक हर जगह राज करती है और काँसे-पीतल के भारी बर्तन तहखाने मे बस शादी-बारातों का इंतजार करते हैं..नही क्या? :-)
वाह.......रहस्य का बेजोड़ समावेश
ReplyDeletebahut badhiyaa ...
ReplyDeleteपहेली जैसा कुछ है क्या ..एक तो अमेरिका है और दूसरा...
ReplyDeleteबेहद खूबसूरत रचना ।
ReplyDeleteसमझने का प्रयास जारी है श्रीश महाराज!!
ReplyDeleteपोस्ट का शीर्षक देखा और सोचा "कि"
ReplyDeleteकि कोई कैसे लिखा लेता है इतना सुन्दर
कि किसी को कैसे मिल जाते हैं इतने शब्द
कि क्यों बन के तस्वीर उभरती है किसी की अभिव्यक्ति
कि क्यों नहीं मिलता हर सवाल का जवाब?
सत्य यही है कि पोस्ट ने मन को छुआ है.
कि पंक्तियां हलकी नहीं बहुत हि वजनदार है, समझने की कोशिश कर रहा हूँ ।
ReplyDeleteबात इ है :
ReplyDeleteकी हम समझे ही नहीं कि कौन दुई झने हैं ??
अगर हम जान जावें तो कवितवा का आनंद चौगुना हो जावे..
बाकी बहुत खुस रहो.... !
ऐसी टिप्पणियाँ देख कर सोच रहा हूँ कि इस ’कि’ के बगैर क्यों कोई बात पूरी नहीं होती !
ReplyDelete’कि’ के बाद का तो सबकुछ है यहाँ, ’कि’ के पहले का ’सिम्पल सेंटेंस’ कहाँ छोड़ दिया ?
तमिल काव्य में एक प्रथा है तुकबन्दी वाले शब्द अंत के बजाय पहले देकर रचने की।
ReplyDeleteकविता स्ट्रक्चर में ऐसी लगती है लेकिन प्रभाव विशुद्ध उर्दू हिन्दी कविता सा है।
रही बात इंगिति की तो बूझें तो और अच्छा, न बूझ पाए तो भी अच्छा - यही तो इसका गुण है।
वाकई थोडा गुलज़ारिश है ये.. कमाल
ReplyDeleteकि ...
ReplyDeleteहर सुबह चुपचाप हाथ
भी मिला लेते हैं ....
दोनों के नफा नुकसान भी तो
आपस में जुड़े हैं...!!
कि कविता अति सुन्दर... है !
ReplyDeleteजानता हूं बखूबी इनको मैं!
ReplyDeleteकि
ये चुगद हैं!
Khoob jamegi jab mil baithenge wala ad yaad aa gaya.
ReplyDeleteaur yaad aa gaye....
ki,...Abe tu kahe to bhai, jaan dein doon !!
ki,Daaru pi hai, teri kasam jhooth nahi boolunga.
ki,aaj chadhi ni yaar....
ki, bhai chalne de yaar ye wali ghazal
ki, i still love her yaar !!
and sooooooooo on !!
wale hostel ke jumle !!
Aaj teen(Dafatan, Lekhni jab furast..., aur shreesh uvach). peg ka nasha hai (waise chadti nahi par patilaya peg the teeno).
ye to wahi baat hui,wo kya tha she'r:
jitni mayassar nahi thi maikhane main utni to ab pe ke chor dete hai paimane main
char gayi mujhe shayad. ladkhadate hue wapis ja raha hoon, wapis aapn to shayad. bachi hui bhi pi jaaon, hangover utarne ke liye.
कि;............
ReplyDeleteki jhuutthe bhaane koee aaj bhi bnaoge....
ki zinda rahne ka sleeka koee seekhe humse....
ki udaas sapata hun kyee din se....
ki aaj ik behad khoobsurat asaani se samjh aane wali kavita padhi.....
अरे वाह!!! बहुत बढिया.
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